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No Problem at Home (A workshop by Karmalogist)

No problem at home – A workshop by Vijay Batra Karmalogist.

The world is full of problems and troubles. Not only one has to deal with it, but must also solve and eradicate the problem. People understand the cause and effect of problems in life, but aren’t fully aware of the solutions to counter such problems, causing immense trouble and pain in life.

So, this workshop is provided to impart the right knowledge to eradicate and counter such beliefs.  It will help to perform righteous actions and karma in daily life, and take the right decisions. This workshop will show the right path with logical methods to save time, money and energy, which is spend unnecessarily because of misguidance and ignorance.

This workshop is for self-discovery and growth. It helps to increase self-confidence, improve relationships, solve problems and make good decisions for emotional, intellectual, physical and spiritual well-being.

Contact to attend the workshop 

Vijay Batra ‘Karmalogist’

Paschim Vihar, New Delhi – 110063

 

 

 

 

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कर्म शिक्षा Karma Education by Karmalogist Vijay Batra

कर्म शिक्षा (Karma Education)

संसार के अधिकतर लोग अपने दैनिक (daily) कर्मों को सुधरने के लिए कोई कार्य नहीं करते है | लगभग सभी लोग अपनी आवश्यकता या विवशता के कारण ही कर्म करते है | यदि दैनिक कर्मों में होने वाली गलतियों को ही सुधार जाये तो पिछले जन्मों में हुए कर्मों के बुरे फल से बचा जा सकता है |

कुछ विशेष प्राप्त करने के लिए विशेष दैनिक कर्म करने की आवश्यकता है | दैनिक कर्म अंधविश्वास या तर्कहीन मान्यताओं पर आधारित होगा तो कर्मफल निराशाजनक मिलेगा और यदि कर्म तर्कसिद्ध होगा तो कर्मफल हितकारी होगा |

संसार के अधिकतर लोग पाप-पुण्य और सही-गलत जैसी चीजों के बारे में भ्रमित हैं क्योंकि सभी बातें एक पहलू से सही और दूसरे पहलू से गलत लगती है । अंधविश्वासों और रूढ़िवादी विश्वासों के कारण लोगों के कर्मों में बहुत अधिक भावनात्मक नुकसान हो रहा है इसलिए ऐसे अंधविश्वासों को समाप्त करने के लिए सटीक आध्यात्मिक ज्ञान की आवश्यकता है ।

दैनिक कर्मों को सुधारने के लिए किसी दुर्लभ ज्ञान की आवश्यकता नहीं है इसके लिए केवल मार्गदर्शक को तार्किक कर्मज्ञान और आध्यात्मिक ज्ञान होना आवश्यक है | पूर्ण मार्गदर्शक द्वारा व्यक्ति को आंतरिक संतुष्टि होने के साथ-साथ सही-गलत पहचानने के लिए आध्यात्मिक दृष्टि विकसित हो जाती है |

कर्म से सम्बंधित कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर सभी लोग जानना चाहते है और इनका उत्तर वही व्यक्ति दे सकता है जिसके पास सम्पूर्ण कर्मज्ञान हो | इनमे कुछ मुख्य प्रश्न है :

  • दूसरों द्वारा मिले आशीर्वाद या श्राप अपने किए कर्मों के फल को कैसे बदल देता है ?
  • एक ही प्रकार के कर्म का फल, दो व्यक्तियों के लिए अलग-अलग क्यों होता है
  • अच्छे कर्म या बुरे कर्म की वास्तविकता क्या है, क्योंकि जो कर्म एक व्यक्ति के लिए सही है वही दूसरे के लिए सही नहीं है |
  • मनुष्य अपने पिछले जन्मों के कर्मों का फल लाखों योनियों में भुगत कर भी इस जन्म में किन कर्मों का फल भोगता है ?
  • जिन कर्मों का फल नहीं मिलता वह कर्म कहाँ जाते है और कुछ कर्मफल बिना इच्छा किए कैसे मिलते है |
  • किन कर्मों का फल मनुष्य जीवन में मिलता है और किन कर्मों का फल मनुष्य जीवन में नहीं मिलता है |
  • जीव द्वारा किए जाने वाले कर्म का फल सकारात्मक होगा या नकारात्मक यह कैसे निश्चित होता है ?
  • किसी भी संबंध बनने के पीछे किस प्रकार के कर्मफल होते है और संबंध का समाप्त होना या अधिक गहरा होना कैसे निश्चित होता है ?
  • सभी जीवों में आत्मा एक सामान है फिर आत्माओं को पुरुष या स्त्री का शरीर कैसे मिलता है और पुरुष-महिला के कर्मफल में भिन्नता क्यों है ?
  • कर्मफल कितने प्रकार के होते है और पिछले जन्मों के कर्मफल का नकारात्मक प्रभाव कैसे बदल सकता है ?

दैनिक कर्म के आधार पर जीवन में मिलने वाले कर्मफल और कर्मफल के प्रभाव को बदला जा सकता है और अगले जन्मों में मिलने वाले कर्मफल को सकारात्मक रूप दिया जा सकता है |

Contact for Karma Education

M: 9811677316, 8800357316

Vijay Batra ‘Karmalogist’

Founder of College of Spiritual Education™

 

 

 

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Napoo Healing in Hindi – Karmalogist Vijay Batra

Napoo Foundation ने तत्व आधारित गूढ़ उपचार विधि (Healing Technique) विकसित की है जो नकारात्मक ऊर्जा(Negativity) और दुष्ट शक्तियों(Evil Powers) को स्थायी रूप से समाप्त करने के लिए अति लाभकारी है | Napoo सभी प्रकार की अशुभ परिस्थितियों और असहनीय दुखों से सम्पूर्ण राहत प्रदान करता है क्योंकि यह एक गुप्त(Secretive) आध्यात्मिक तकनीक(SpiritualTechnique) है |

Napoo healing भारतीय मूल की तत्व आधारित विश्व की एकमात्र तात्विक healing पद्धति है जो विशेष रूप से उन लोगों के लिए है जो नकारात्मक शक्तियों और हानिकारक ऊर्जा से प्रभावित है | इसे Napoo Foundation द्वारा गुप्त रहस्यमयी विषयों पर कई वर्षों के गहन शोध (Reserch) के बाद शुरू किया गया है । Napoo Foundation की स्थापना श्री विजय बतरा “Karmalogist’ ने 2004 में इस उद्देश्य से की थी कि बुरी नज़र, टोना टोटका, मंत्रघात, श्राप, प्रेतात्माओं इत्यादि नकारात्मक शक्तियों से होने वाली पीड़ा और कष्टों के लिए संसार में भयमुक्त और कम खर्च वाली उपचार पद्धति उपलब्ध हो |

Napoo Healing उपचार पद्धति के पीछे मूल अवधारणा यह है कि हमारा शरीर पंचतत्वों (अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी और आकाश) से बना है इसलिए जब किसी व्यक्ति पर नकारात्मक शक्ति या ऊर्जा का प्रभाव होता है तब शरीर के तत्व असंतुलित हो जाते हैं जो मानसिक, शारीरिक और आर्थिक समस्याओं का कारण बनते है इसलिए यदि शरीर के सभी तत्व संतुलित हो जाये तो जीवन में कोई भी समस्या नहीं होगी | सभी पंचतत्वों को संतुलित करने से ग्रहों के नकारात्मक प्रभाव और दूसरों द्वारा होने वाली हानि भी अपने आप समाप्त हो जाती है | भारत में एक ही Napoo healing केंद्र है जिसमे सभी समस्याओं के लिए तत्व उपचार करने के अतिरिक्त श्री विजय बतरा “karmalogist’ द्वारा इच्छुक लोगों को तात्विक Napoo healing शिक्षा दी जाती है ।

दूसरों की नकारात्मक ऊर्जा का सभी लोगों की समस्याओं से बहुत गहरा सम्बन्ध है क्योंकि जीवन में उत्पन्न होने वाली अधिकतर समस्याएं दूसरों की नकारात्मक ऊर्जा के कारण ही होती है | दूसरों के विचार, दूसरों की गति और दूसरों का स्वभाव, शारीरिक तत्वों को प्रभावित करके व्यक्ति को गुप्त रूप से संचालित करता है | आकाशगंगा में स्थित ग्रह भी अपनी सूक्ष्मकिरणों द्वारा शरीर के तत्वों को निरंतर प्रभावित करती है जिससे प्रतिदिन नई समस्या का सामना करना पड़ता है | इसी प्रकार पृथ्वी ग्रह और पृथ्वी पर स्थित सभी जीवों और वस्तुओं द्वारा शारीरिक तत्व असंतुलित होते रहते है |

Napoo Foundation के संस्थापक श्री बतरा जी ने कई सालों तक तत्व विज्ञान के बारे में खोज की और समस्या के आधार पर तत्व प्रयोग विधि विकसित की है जो यह सुनिश्चित करती है कि कौन सी समस्या के लिए किस तत्व का (कितना और कैसे) प्रयोग करना चाहिए | किसी समस्या के लिए तत्वविधि को विकसित करके उसको प्रयोग करने वाले विश्व भर में एकमात्र व्यक्ति श्री बतरा जी है | Napoo तात्विक हीलिंग पद्धति द्वारा ग्रहों के नकारात्मक फल और बुरी नज़र(Evil eye), टोना-टोटका(Black Magic), मंत्रघात(Spells) श्राप(Curse) प्रेतात्मा(Spirit) से स्थायी रूप से छुटकारा मिलता है | Napoo हीलिंग का किसी धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं है यह किसी भी व्यक्ति को उसके धार्मिक या आध्यात्मिक विश्वासों को बदलने के लिए नहीं कहता है और यह तात्विक healing अन्य सभी प्रकार की healings और अनुष्ठानों से बिलकुल अलग है |

वर्तमान समय में नकारात्मकता और तंत्र प्रभाव समाप्त करने के लिए Napoo healing सबसे सटीक और प्रभावी healing है जो अपनी अद्वितीय तात्विक प्रणाली और स्थायी परिणामों के कारण विश्व में बहुत तेज़ी से प्रचलित हो रही है | Napoo  healing नकारात्मकता और दुष्ट शक्तियों से सुरक्षा देने वाला अति प्रभावकारी तरीका है जिसका उपयोग कोई भी व्यक्ति किसी भी समय और किसी भी मानसिक पीड़ा या शारीरिक कष्ट के लिए कर सकता है यह सभी प्रकार की अशुभ स्थितियों और दुखों से उत्कृष्ट राहत प्रदान करता है क्योंकि यह सबसे गुप्त आध्यात्मिक तकनीकों में से एक है जो अंधविश्वास और आधे अधूरे ज्ञान पर आधारित नहीं है |

Napoo का उपयोग कर सकते है :

  • जब कोई परिवार के सदस्यों के बीच संघर्ष पैदा करने के लिए नकारात्मक ऊर्जा का प्रयोग करता है
  • जब कोई पति-पत्नी के बीच अलगाव पैदा करने के लिए अनावश्यक कारण बनाता है
  • जब कोई आपकी सफलता को रोकने के लिए नकारात्मक शक्तियों के माध्यम से बाधा पैदा करता है
  • जब किसी की नकारात्मक ऊर्जा आपको शारीरिक रूप से हानि पहुँचाती है या आप हमेशा बीमार महसूस करते हैं, लेकिन चिकित्सा रिपोर्ट वास्तविक समस्या को पहचानने में विफल होती है
  • जब सभी अन्य चिकित्सा तकनीक नकारात्मक ऊर्जा को समाप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं
  • जब कोई आपके मन और शरीर को नियंत्रित करता है और आपको गलत गतिविधियों या गलत फैसलों में खींचता है
  • जब सभी उपाय व आशीर्वाद निष्फल हों और शुभकर्म करने पर भी कोई सकारात्मक परिणाम प्राप्त नहीं होता है
  • जब कोई प्रार्थना या आशीर्वाद, नकारात्मक ऊर्जा और मस्तिष्क प्रोग्रामिंग के खिलाफ काम नहीं करता है
  • जब आपका मन सोचने में असमर्थ है, तो हमेशा भ्रमित और भयभीत है
  • जब आपकी आभा नकारात्मक शक्तियों को आकर्षित करता है जो मस्तिष्क और दुर्भाग्य का कारण बन जाता है
  • जब केवल नकारात्मक विचार सच हो जाते हैं और आप सकारात्मक सोचने में असमर्थ होते हैं
  • जब घर में नकारात्मकता और भारीपन महसूस हो रहा है, तो सभी रिश्तों में झगड़े, तर्क और मतभेद पैदा हो जाते हैं।
  • जब नकारात्मक ऊर्जा सभी कुछ स्थायी रूप से नियंत्रित कर लेती है जिससे चेहरे और घर की चमक समाप्त हो जाती है

Napoo healing और Napoo Learning के लिए संपर्क करें |

विजय बतरा Karmalogist

Founder : Napoo Foundation

Copyrights (C) All Rights Reserved.

 

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Spiritual Coaching by Karmalogist Vijay Batra

Spiritual Coaching by Karmalogist

Karmalogist Vijay Batra started Spiritual coaching in 2004 to educate others and understand self-spiritual level for upliftment and enlightenment of the Soul. This coaching is totally different from all other traditional teachings and orthodox beliefs. It provides answers to all those questions which are still considered unanswerable.

In first hand, coaching by Karmalogist is to improve daily karma which is incorrectly performed because of old beliefs and superstitions and to provide techniques for balancing consequences of past Karma and present Karma by Spiritual logic based methods.

Maximum people of the world are confused about things like virtue-sin and right-wrong. Superstitions and stereotypical beliefs cause immense emotional harm to the Karma of people. They need the right knowledge to eradicate and counter such beliefs. If you have an interest in spirituality, you must choose logic based spirituality instead of superstitions.

Each person has a personal soul mission or life purpose. This mission is something you agreed to undertake and learn during this lifetime prior to incarnating. Lessons may include themes such as learning to be compassionate, self-reliant, a leader, or about forgiveness, patience or sharing with others. There is infinite number of such soul growth lessons for us to learn and each of us has our own set of life themes and lessons. To choose your life purpose you need to know a few things logically. You must have knowledge of your religious stage and spiritual achievements.

Karmalogist also assists for self-discovery and growth. He helps to increase self-confidence, improve relationships, solve problems and make better decisions for emotional, intellectual, physical and spiritual well-being. He also plays a tremendous part in daily life to remove guilt for all types of mistakes and sins. Karmalogist is contributing to make this world Superstition-free, to get inner peace and happiness at personal and spiritual front. He is transforming your Spiritual life with this breakthrough coaching.

Karmalogist helps to escape from all superstitions related to astrology and illogical belief of planets and remedies. He is committed to show the right path with natural methods to save time, money and energy which people spend unnecessarily because of wrong guidance in life. Karmalogist explains positive and negative effects for every type of remedy and can be consulted when one is confused, depressed or scared.

Program your Spiritual life with Karmalogist Vijay Batra

  • Eliminate superstitions, orthodox belief system
  • Achieve more spiritual awakening and upliftment
  • Improve daily performed karma for a better life
  • Increase spiritual vision to eradicate fears and limitations

To know more about Karmalogist search on Google and watch videos on YouTube.

Karmalogist Vijay Batra is a dynamic spiritual life coach for logic based spiritual concepts.  He is the inventor of a breakthrough spiritual coaching and integrates all his learning to create one of the most powerful and life changing experiences you will ever witness.

Individual coaching is also available

For more details and queries contact to Vijay Batra “Karmalogist”

Call: 9811677316, 8800357316

 

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Napoo Yantra

Napoo Yantra is used for protection against negative energy, evil eye and black magic. It provides excellent relief from inauspicious situations and sufferings.

The Yantra must be put at the main entrance of the home to protect the family and it can be used in bedrooms when negativity affects personal relationships.

People in India and abroad have been benefitted through Napoo Yantra and are living a safe life without any negative energy problems. Napoo Yantra can be collected for free of cost from Napoo Foundation office.

Important note: Napoo foundation is the sole provider of Napoo Yantra. Copying it for money collection or advertisement will be considered as an offence.

Napoo Foundation

Founder : Vijay Batra Karmalogist

Paschim Vihar, New Delhi, India

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Change Your Destiny – Karma Education by Karmalogist

Change your destiny – Karma education by Karmalogist 

Earlier, there were many unanswered questions without satisfactory answers like :

  • Why some are born poor and some rich?
  • Why some are ugly and some beautiful?
  • Why some are healthy and some are born disabled?
  • Why some are suffering and some enjoying luxurious life?
  • Why humans suffer when everything is done by God?
  • Why some get no benefits of their hard-work and some get everything without doing anything?
  • Why some are happy with nothing and some sad with everything?
  • Why certain things are sin for some people not for everyone?
  • Why negativity works stronger than positivity? Etc.

But now, we have logical answers for all such questions except saying it’s all by chance.  We have been observing that nothing is happening around just by chance. Maximum people of the world are confused about things like virtue-sin and right-wrong. Superstitions and stereotype beliefs cause immense emotional harm to the Karma of people. They need the right knowledge to eradicate and counter such superstitions and beliefs.

Karmalogist offers you an innovative learning called Karma education which will help you  to improve daily Karmas which are incorrectly performed because of superstitions and old beliefs. Karma Education by Karmalogist cannot be found in legendary and recognized books. This is quite different from other orthodox teachings and rituals and not available elsewhere.

About Karma and Spiritual Education :-

Spiritual practice is a very good way for spiritual growth, but, before practicing you must have the right wisdom to know if you will achieve your spiritual target through your practices. Spiritual practices are incomplete if you don’t have logic based wisdom of your spiritual queries.  To get something different and unique you need to learn different from legendary books.

If you are doing same as others, you will also be confused like them in your spiritual journey because your available information is incomplete. You can experience invisible divine power only when you have complete academic knowledge and guidance to develop your abilities.

Sh. Vijay Batra Karmalogist has been teaching Karma and Spiritual Education since many years,  which gives logic based answers to questions that are considered unanswerable such as :

  • Religion and Spirituality ●The theory of formless presence of God ●Birth of Soul and Types of Souls ● The working and types of Karmas. The factors affecting the consequences ●Real Meaning of Salvation and technique to attain it ●how to get rid of orthodox beliefs, fears, confusions etc. ●Worldly problems and circumstances ●Evil spirits and negativity ●Vision to recognize sin-virtue and right wrong according to spirituality.
  • No religious knowledge required
  • No books/writings/ notes required
  • No orthodox teachings
  • No traditional Practices

Individual teaching facility is also available.

Call: +91 – 9811677316, 8800357316

 

 

 

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गुरु की पहचान – Vijay Batra Karmalogist

गुरु की पहचान

लेखक : विजय बतरा Karmalogist

गुरु शब्द में बहुत सारी आशा और सकारात्मकता है, ऐसा कहा भी जाता है कि जिसके सिर पर उसके गुरु का हाथ है उसको भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है | गुरु होने पर व्यक्ति को लगता है कि उसके सिर पर ऐसी छत्रछाया है जिसके कारण वह सभी प्रकार की समस्याओं और अनहोनियों से सुरक्षित है, उसके सभी कार्य निर्विघ्न(बिना रूकावट) हो जायेंगे और उसके द्वारा जाने-अनजाने हो गए सभी पापों को गुरु क्षमा करेंगे और उसे बुरे कर्मों के दंड का सामना नहीं करना पड़ेगा |  गुरु पर विश्वास करने वाले व्यक्ति की श्रद्धा देवी देवताओं पर होने वाली श्रद्धा से अधिक होती है क्योंकि उसके अंतर्मन में यह निश्चित होता है कि जो कार्य देवी देवता भी नहीं कर सकते वह मेरा गुरु कर सकता है इसका एक कारण यह भी है कि देवी देवता उसके सामने नहीं है जबकि गुरु से वह अपने मन की बात करके अपनी इच्छा या समस्या का समाधान पा सकता है | प्रत्येक व्यक्ति की अपनी श्रद्धा और विश्वास पर निर्भर करता है कि उसके मन में उसके गुरु का क्या स्तर है | जब व्यक्ति की श्रद्धा, विश्वास और उसके गुरु का स्तर तीनो मिल जाते है तो संसार का हर असंभव कार्य बड़ी सरलता से हो जाता है |

ऐसे तो संसार में हर व्यक्ति गुरु और शिष्य दोनों है क्योंकि सभी लोग एक दूसरे को प्रत्यक्ष-अप्रयक्ष रूप से बहुत कुछ सिखाते है, फिर भी प्रत्येक व्यक्ति एक ऐसे गुरु की तलाश में है जो उसे सांसारिक और अध्यात्मिक ज्ञान देकर कृतार्थ करे | अनेक प्रकार की  मान्यताओं और अंधविश्वासों के कारण आज संसार में सच्चे गुरु की पहचान होना या सच्चे गुरू का मिलना असंभव सा लगता है परन्तु ऐसा नहीं है कि सच्चे गुरु संसार में नहीं है यदि ऐसा होता तो आज संसार में धर्म या आध्यात्म की कोई बात ना हो रही होती | यह एक अलग बात है कि साधारण व्यक्ति को ज्ञान की कमी और गुरु के बारे में उसकी जानकारी के कारण भ्रम की स्थिति बनी रहती है क्योंकि किताबों में गुरु के बारे में जो लिखा हुआ है वर्तमान गुरु उसके बिलकुल विपरीत दिखता है | वेशभूषा और किताबी बातों द्वारा स्वयं को गुरु बता कर दिशाहीन और भयभीत करने वाले गुरु हर स्थान पर मिलते है जिनके पास स्वयंज्ञान नहीं है, ऐसे लोगो के कारण ही धर्म(नियम) में इतना अंधविश्वास मिश्रित हो चुका है कि अब साधारण व्यक्ति धार्मिक या आध्यात्मिक होने से भी डरता है | सभी को भली प्रकार से पता है धर्म की आड़ में साधारण व्यक्ति की श्रद्धा और विश्वास का किस प्रकार से शोषण होता है |

प्राचीनकाल की तुलना में आज का व्यक्ति अधिक समझदार है और इसके पास जानकारी के लिए इन्टरनेट और पुस्तकों के अथाह सागर है जिसमें उसके सभी प्रश्नों के उत्तर है परन्तु परिवार और बाहरी जानकारी के अनुसार उसके मन में जो निस्वार्थ और कृपालु गुरु की छवि है वैसा गुरु उसे कहीं नहीं मिलता जिसके कारण आज का व्यक्ति सही-गलत और पाप-पुण्य को लेकर बहुत अधिक भ्रमित और भयभीत है | परिवार से मिले धर्म-संस्कारों पर चलने पर व्यक्ति अपने आपको पापी और गुनाहगार समझता है, हर कार्य करने के साथ वह भय और भ्रम की स्थिति में रहता है कि कहीं उसके द्वारा किया कोई कार्य पाप ना हो या किसी की आत्मा को कष्ट ना हो जाये जिससे मुझे दंड में नरक भुगतना पड़े | स्वर्ग की लालसा और नरक का भय सभी धार्मिक व्यक्तियों में है, परन्तु फिर भी अपनी सुविधा और आवश्यकता को पूरी करने के लिए व्यक्ति धर्म(नियम) की उलंघना करता है | सही मार्ग से व्यक्ति का मन नहीं भटके इसीलिए ही सभी को एक सच्चे और निस्वार्थी गुरु की आवश्यकता है |

सभी व्यक्तियों को धर्म में यह बताया जाता है कि मनुष्य का जन्म चौरासी लाख प्रकार के जन्मो के बाद मिलता है मनुष्य जन्म में जो भी पाप किये होते है उसके बदले चौरासी लाख प्रकार के जीव जंतुओं के जन्म मिलते है । केवल गुरु इस बात का ज्ञान देता है कि जब पिछले मनुष्य जन्म के पापों के बदले चौरासी लाख प्रकार के जन्मो का भुगतान कर लिया है तभी यह जन्म मिला है तो मनुष्य बनते ही अपने आप को पिछले जन्मो के कर्मो का पापी मानना मूर्खता व कायरता है और संसार में भयभीत होकर नहीं भयमुक्त होकर रहना है |

गुरु द्वारा यह भी समझाया जाता है कि सांसारिक जीवन के लिए धर्म अच्छा है, यदि व्यक्ति धर्म से चलेगा तो किसी के साथ कोई छल-कपट नहीं करेगा जिससे पापकर्म कम बनेंगे और उसके जीवन में कर्मफल से आने वाली समस्याओं का अवसर कम होगा, परन्तु धर्म निराकार को समझने के लिए नहीं है । निराकार को तभी जान सकते है जब सभी सांसारिक वस्तुओं, संबंधों, आदतों, भावनाओं, कर्मों को छोड़ कर शून्य की अवस्था आयेगी । निराकार का धर्म से कोई लेना देना नहीं है, धर्म मनुष्य ने बनाया है जिससे आत्मा और शरीर को  नियम में चलने का अभ्यास बना रहे । संसार में साकार (दिखने वाला सभी कुछ) से सम्बंधित नियम धर्म है और किसी कर्म, वस्तु, व्यक्ति, नियम पर निर्भर रहे बिना निराकार से जुड़े रहना आध्यात्म है । धर्म में स्थान, समय, नियम, व्यक्ति इत्यादि को महत्त्व दिया जाता है जबकि आध्यात्म में किसी भी व्यक्ति, स्थान, वस्तु और नियम का कोई महत्त्व नहीं है, शून्य को समझना और शून्य होना ही आध्यात्म है । धर्म और आध्यात्म में यही अंतर है कि धर्म भययुक्त है और आध्यात्म भयमुक्त है, व्यक्ति ने धार्मिक बनना है या अध्यात्मिक बनना है यह उसकी स्वयं की इच्छा और उसे ज्ञान देने वाले गुरु पर निर्भर करता है । केवल गुरु की शरण में रह कर ही यह सीखा जा सकता है कि धर्म की बैसाखी का सहारा लेकर निराकार को समझना असंभव है क्योकि धर्म का त्याग करके ही आध्यात्मिक बना जा सकता है ।

ऐसा ज्ञान एक सच्चे गुरु द्वारा ही मिलता है कि कर्मों की पूँजी केवल आत्मा बनती है शरीर से कोई कर्म नहीं बनता और उनके फल शरीर द्वारा भोगे जाते है, वह शरीर मनुष्य का हो या किसी जीव जंतु का हो शरीर भोगने के लिए है जबकि प्राय: यह कहा जाता है कि व्यक्ति शरीर से जो भी करता है उसी का फल भुगतना पड़ता है |  धार्मिक स्थान पर जाकर भी व्यक्ति की आत्मा (ध्यान/विचार) घर पर है तो वहां जाने का कोई लाभ नहीं है बिना आत्मा के कर्म करना शरीर को कष्ट देना है | पिछले मनुष्य जन्म के पाप भी व्यक्ति ने चौरासी लाख प्रकार के जन्म लेकर ही भोगे थे तो आज व्यक्ति किस बात से डरता है । आज प्रत्येक व्यकि अपनी क्षमता और उपलब्धता के अनुसार भ्रम और भय से मुक्ति की खोज में लगा हुआ है परन्तु भ्रम और भय से  मुक्ति तभी हो सकती है जब व्यक्ति के पास ऐसा गुरु हो जो उसे सही ज्ञान द्वारा अन्धविश्वास और सुविधा या दूसरों से लाभ लेने के लिए बनी मान्यताओं से मुक्त कर सके |

धर्म संसार के लिए है मनुष्य ने अपनी सुविधा के लिए अलग अलग धर्म बनाये है, इसमें व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक धर्म है, इन धर्मों का पालन कैसे करना है यह सिखाना गुरु का कार्य है | आध्यात्म आत्मा के लिए है आत्मा द्वारा किए कर्म का फल कैसा मिलता है और उससे कैसा बचा जा सकता है या बताना और समझाना भी गुरु का ही कार्य है | धर्म और अध्यात्मिक में व्यक्ति का मस्तिष्क बहुत अधिक उलझ चुका है इसलिए वह सही और गलत का निर्णय करने में सक्षम नहीं है इसी कारण उसके मन में अनेकों प्रश्न है जैसे : गुरु की आवश्यकता क्यों है ? गुरु का क्या कार्य है ? गुरु कैसा होना चाहिए ? गुरु कब और कहाँ मिलेगा ? गुरु की पहचान क्या है ? गुरु की महिमा देवी देवताओं से अधिक क्यों है ? गुरु के बिना गति क्यों नहीं है ? इत्यादि |

व्यक्ति के दैनिक जीवन में बहुत सारी ऐसी समस्याएं और परिस्थितियां आती है जिनके समाधान या मार्गदर्शन के लिए उसे एकदम सही उत्तर की आवश्यकता होती है हालांकि अधिकतर उत्तर व्यक्ति को स्वयं पता होते है फिर भी भ्रम और भय की स्थिति में व्यक्ति को किसी ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता होती है जिस पर ईश्वर की कृपा हो, जिसके पास कर्म और कर्मफल को बदलने/बदलवाने का अधिकार हो, जिसे सांसारिक और अध्यात्मिक ज्ञान हो, जिसका अपना कोई स्वार्थ नहीं हो, जो भूतकाल से भविष्यकाल तक को देख सकता हो और उसी अनुसार निस्वार्थ(बिना लालच) ऐसी युति(गुर) सिखाये जिससे उसकी सभी समस्याओं और परिस्थियों पर विजय हो जाए | सच्चा और पूर्ण गुरु वही है जो अपने शिष्य को ऐसी युति(ऐसा गुर) सिखाये जो उसे साकार संसार में और देह छोड़ने के बाद के रहस्मयी संसार में काम आयें |

गुरु की पहचान

गुरु कही भी मिल सकता है, यह आवश्यक नहीं है कि गुरु किसी विशेष वेशभूषा में ही होगा, वेशभूषा का प्रयोग निजी लाभ के लिए मूर्ख बनाने या दिशाहीन करने में भी किया जा सकता है सच्चे गुरु को वेशभूषा या दिखावे में कोई रुचि नहीं होती, ना ही वह अपनी प्रशंसा सुनने का इच्छुक होता है | साधू की वेशभूषा भगवा रंग की होती है इसका अर्थ यह नहीं है कि भगवा पहनने वाले सारे लोग साधू विचारों के होते है इनमे स्वार्थी और कपटी लोग भी हो सकते है | साधू का भगवा रंग धारण करने के पीछे गूढ़ वैज्ञानिक कारण है जिसका स्वयं साधुओं को भी पता नहीं है | सूर्य का रंग भगवा है, प्रात:काल सूर्य उदय होने पर परिवार के सदस्य एक-दूसरे से दूर होने लगते है पति-पत्नी अपनी आजीविका के लिए और बच्चे शिक्षा इत्यादि के लिए बाहर जाते है | सूर्य अस्त के बाद परिवार फिर से घर में एकत्रित हो जाता है, इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि सूर्य पारिवारिक सुख से वंचित करता है साधू के भगवा पहनने का अर्थ यह है कि इस व्यक्ति ने पारिवारिक सुखों का त्याग करके भगवा धारण कर लिया है और अब पारिवारिक जीवन नहीं चाहता, बाकि का जीवन सांसारिक वस्तुओं और लोगो से दूर रहेगा | प्राय: लोग आशीर्वाद पाने के लिए साधू को आवश्यकता से अधिक सुविधा उपलब्ध करा कर उनका मन भटकाते है, सुख सुविधा को देखकर सच्चे साधू का मन भी संसार की और आकर्षित होने लगता है,  ऐसा करके वह लोग अपने पाप कर्म की पूँजी जमा करते है क्योंकि सुविधाओं को भोगने पर साधू अपने लक्ष्य से भटक कर निराकार से दूर हो जाता है |

सच्चे गुरु की पहचान का पहला लक्षण यह है कि गुरु किसी वेशभूषा या ढोंग के अधीन नहीं है और उसके चेहरे पर सूर्य के सामान तेज दिखता है और उसकी छठी इंद्री पूर्णत: विकसित होती है जिसके द्वारा वह भूत, वर्तमान और भविष्य को देख पाता है | सच्चा गुरु ज्ञान देने में प्रसन्न होता है ज्ञान को छुपाने वाला या भ्रमित करने वाला सच्चा गुरु नहीं होता | यह बात भी सभी जानते है कि संसार में जीवित रहने के लिए धन की आवश्यकता है, अकारण आवश्यकता से अधिक धन का मांगना गुरु के लालची और स्वार्थी होने का चिन्ह है , गुरु को स्वार्थी होने का अधिकार नहीं है स्वार्थ संसार के लिए है अध्यात्म में स्वार्थ का त्याग होना अति आवश्यक है जिसका सही ज्ञान सच्चे गुरु द्वारा ही मिलता है |

किसी व्यक्ति में गुरु वाले गुण होने के लिए अच्छे कर्मों की पूँजी होना अति आवश्यक है और जब अच्छे कर्मों की पूँजी गुरु के खाते में है तो उसे धन और अन्य सांसारिक वस्तुओं के पीछे भागने की आवश्यकता नहीं होती बल्कि अच्छे कर्मों के प्रभाव से उसकी आवश्यकता के अनुसार वस्तुएँ गुरु तक अपने आप पहुँचती है | जब कर्मों की पूँजी होती है तो व्यक्ति में इतना संतोष और नम्रता आ जाती है कि धन की पूँजी के लिए मन विचलित नहीं होता | गुरु कहलाने के बाद गुरु का यह दायित्व है कि वह अपने शिष्यों और साधारण व्यक्तियों का सही मार्गदर्शन करे यदि गुरु ज्ञान का प्रयोग धन अर्जित करने या किसी निजी स्वार्थ के लिए करता है तो गुरु के लिए क्षमा नहीं होती और उसे साधारण व्यक्ति से सौ गुना अधिक दंड भोगना पड़ता है क्योंकि गुरु को पाप-पुण्य का ज्ञान होता है | साधारण व्यक्ति के गलती करने पर उसके लिए क्षमा का अवसर और विकल्प है परन्तु गुरु जिसे धर्म और आध्यात्म दोनों की समझ है उसके लिए साधारण व्यक्ति से कही अधिक दंड भुगतना पड़ता है क्योंकि उसके पास साधारण व्यक्ति से अधिक ज्ञान है |

गुरु अपने शिष्य को धर्म(सांसारिक नियम) और आध्यात्म(निराकार), दोनों का अंतर और निराकार को समझने का सरल मार्ग भी बताता है, अधिकतर लोग स्वयं को धार्मिक और आध्यात्मिक दोनों समझते है जबकि ऐसा नहीं है | धर्म नियम है जो स्वयं और संसार को व्यवस्थित करने में सहायक होता है, धर्म संसार के लिए है सभी संबंधों के लिए अलग अलग धर्म(नियम) है जैसे गुरुधर्म, शिष्यधर्म, पिताधर्म, माताधर्म, भाईधर्म, बहनधर्म, मित्रधर्म, राजधर्म, मंत्रीधर्म, नागरिकधर्म, इत्यादि इत्यादि |  धर्म (नियम) बहुत सारे है इसलिए व्यक्ति आवश्यकता और विवशता के कारण अपनी सुविधा के अनुसार नियमों और अपनी मान्यताओं को समय समय पर बदलता रहता है जबकि आध्यात्म सभी संबंधों, नियमों से मुक्त होकर निराकार का ज्ञान होने की अवस्था है आध्यात्म का सम्बन्ध आत्मा से है इसलिए इसमें कोई नियम नहीं है, ना ही इसमें कही कोई असुविधा है कि इसको बदलने की आवश्यकता पड़े |

गुरु केवल देने(दूसरो) के लिए है गुरु द्वारा वचन और कर्म व्यक्ति के कल्याण में काम आते है, अपने लिए लेने वाला गुरु नहीं होता, गुरु जिसे सांसारिक वस्तुओं की चाह नहीं होती, गुरु का सम्बन्ध आत्मा से है शरीर से नहीं, जो धन और जाति के कारण भेदभाव नहीं करता | गुरु जो प्रत्येक शिष्य की प्रेम, विश्वास और लगन के अनुसार उसके अध्यात्मिक स्तर को बढाने में सही मार्गदर्शन करता है | गुरु शिष्य के लिए जो कुछ भी करता है उसे कभी भी जतलाता नहीं है, ना ही अपने शिष्य द्वारा प्राप्त किए धन, मन-सम्मान, अध्यात्मिक स्तर का श्रेय लेता है | गुरु अपने शिष्य से ऐसे कर्म करवाता है जो केवल शिष्य हित में होते है, गुरु काअपने  शिष्य के कर्म निजी लाभ के लिए प्रयोग करना वर्जित है |  गुरु की महिमा देवी देवताओं से अधिक है क्योंकि देवी देवता सीमित शक्ति/ कला के मालिक है, जिस व्यक्ति को जैसा चाहिए वह उस शक्ति/ वस्तु के मालिक देवी देवता की उपासना करके अर्जित कर लेता है जबकि गुरु सीधा निराकार से जुड़ा होने के कारण सभी कुछ ठीक प्राप्त करने में सहायक बनता है | साधारण व्यक्ति भी अपने अच्छे कर्मों और निस्वार्थ भावना से गुरु बन सकता है परन्तु यदि शिष्य का लक्ष्य गुरु बनना है तो वह अधूरा गुरु ही बन पता है वह पूरा गुरु नहीं बन सकता | पूरा गुरु का अर्थ है जो निस्वार्थ सब कुछ कर सकता है |

ईश्वर की कृपा और अपने कर्मो की पूँजी के अनुसार गुरु की शक्तियां अपने आप विकसित होने लगती है आध्यात्मिक स्तर बढ़ने के साथ साथ इन शक्तियों का विकास भी होता रहता है, सबसे पहले गुरु में वाकशक्ति/वाक्यशक्ति विकसित होती है वाक्यशक्ति विकसित होने पर गुरु द्वारा कही गयी सभी बाते पूरी होने लगती है | यहाँ तक की किसी व्यक्ति के भाग्य में ना होने वाली वस्तुएँ गुरु के वाक्य/वचन से मिलने लगती है, अनेकों लोगो की संतान होना या ऐसे कार्य होना जिसकी कल्पना भी ना की जा सकती हो, यह वाक्यशक्ति विकसित हो चुके होने का ही लक्षण है | वाक्यशक्ति के बाद गुरु में स्पर्श शक्ति विकसित होती है गुरु के आगे मस्तक झुकाने का एक कारण यह भी है कि गुरु अपने स्पर्श द्वारा मस्तक झुकाए व्यक्ति की सारी नकारात्मकता समाप्त कर देता है , गुरु के शरीर में जो सकारात्मकता संचार कर रही होती है वह व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर जाती है जिसके परिणाम से ग्रहों का प्रभाव, हानि, दुर्घटना, बुरे कर्मों का फल, शत्रु, बुरी नज़र, भूत-प्रेत इत्यादि से बचाव रहता है |

वाक्यशक्ति और स्पर्शशक्ति का प्रयोग संसार की इच्छाओं की पूर्ती के लिए होता है, लोगों का कल्याण करते करते गुरु में आत्मशक्ति विकसित हो जाती है | आत्मशक्ति संसार के लिए नहीं होती यह अलौकिक शक्ति होती है जो निराकार से जुड़े रहने के काम आती है | किसी चित्र/मूर्ती, नाम/मंत्र, स्थान, विधि इत्यादि पर अधीन ना होकर, खुली आँखों पर भी निराकार से जुड़े रहने की अवस्था को आत्मशक्ति विकसित होना कहते है | आत्मशक्ति का प्रयोग गुरु अपने शिष्यों की परलोक में सहायता करने में करता है | गुरु की मृत्यु के पश्चात, गुरु के स्थान में वह स्पर्शशक्ति और वाक्यशक्ति का प्रभाव रहता है , सच्चे गुरु की मृत्यु के पश्चात उसके स्थान को स्पर्श करने से मन को शांति और सुरक्षा का आभास होता है और वहां पर उच्चारण की जाने वाली सभी बाते पूरी हो जाती है |

वाक्यशक्ति, स्पर्शशक्ति और आत्मशक्ति तीनो होने पर गुरु में त्रिशक्ति होती है जिसके कारण कुछ भी सोचा या कहा गया पूरा होता है, यह त्रिशक्ति देवी देवताओं के पास नहीं होती क्योंकि देवी देवताओं के पास वाक्यशक्ति और स्पर्श्शक्ति को प्रयोग करने के लिए शरीर नहीं होता | देवी देवताओं के पास सीमित अधिकार/ शक्तियां होती है जैसे धन की देवी लक्ष्मी, विद्या  देवी की सरस्वती, ज्ञान के देवता बृहस्पति, इत्यादि देवी देवताओं के पास अलग अलग अधिकार/शक्तियां है | जो कार्य देवी देवताओं की उपासना से भी नहीं हो सकते वह गुरु के एक वाक्य से हो जाते है | इसीलिए कहा जाता है कि गुरु के पास ऐसी चाबी होती है जो हर बंद ताले को खोल सकती है | गुरु की निस्वार्थ भावना के कारणदेवी देवता भी गुरु की कही बात हो नहीं टालते |  जाने अनजाने बहुत से ऐसे कर्म हो जाते है जिसके कारण देवी- देवता, मृत्यु पश्चात भटक रहे पित्र(पूर्वज) और भूत-प्रेत क्रोदित हो जाते है, इन सभी के क्रोध का प्रभाव केवल गुरु के आशीर्वाद और सुदृष्टि से ही समाप्त होता है |

गुरु के पास इच्छा, आवश्यकता या विवशता के समय कर्मों की पूँजी को देने या लेने का अधिकार होता है । किसी व्यक्ति की भक्ति, प्यार, नम्रता, समर्पण इत्यादि से प्रसन्न हो कर भाग्य द्वारा ना मिलने वाली वस्तु को दे देना गुरु की इच्छा पर निर्भर है । सालों बाद किसी गुरु के आशीर्वाद से संतान हो जाना या बीमारी ठीक हो जाना गुरु द्वारा ऐसे कर्म दे देना होता है जो उस व्यक्ति के भाग्य में नहीं होता । किसी व्यक्ति द्वारा अपनी वाणी, भाव इत्यादि द्वारा अपने शुभ कर्मों का दुरूपयोग करने पर गुरु को उसके शुभ कर्मो को लेकर किसी और को देने का अधिकार होता है । सम्पूर्ण गुरु की कृपा या आशीर्वाद से सांसारिक और आध्यात्मिक सभी प्रकार की इच्छाओं को पूर्ण किया जा सकता है । व्यक्ति को समय समय पर गुरु की आवश्यकता इसलिए भी होती है कि गुरु ऐसे गुर सिखाता और बताता है जो पुस्तकों में नहीं मिलते ।

 

कलयुग गुरुओ से भरा पड़ा है परन्तु सही मार्ग दिखने वाले गुरुओं की कमी है, ऐसे में साधारण व्यक्ति के लिए गुरु का चयन करना अति कठिन है | सच्चा गुरु अपना ज्ञान और शक्ति विकसित करने की युति सरलता से अपने शिष्य/ भक्त को नहीं देता, इसका मुख्य कारण यह होता है कि कहीं शिष्य उस ज्ञान का दुरूपयोग निजी स्वार्थ के लिए ना कर ले | गुरु ज्ञान तभी देता है जब उसे यह निश्चित होता है कि उसका शिष्य इस योग्य है कि ज्ञान का दुरूपयोग नहीं होगा और शिष्य को समझ है कि ज्ञान का सदुपयोग कब कितना और कैसे करना है | शिष्य के इस स्तर को बार बार परखने के बाद ही गुरु अपने शिष्य को ज्ञान देता है | शिष्य की परख करने के लिए गुरु कटु वचनों का प्रयोग भी करता है और शिष्य को कठिन और अस्विकारिय कार्य करने को कहता है, यदि शिष्य बिना प्रश्न और संदेह किए गुरु की कसौटी पर खरा उतरता है तो शिष्य को गुरु द्वारा आशीर्वाद और कृपा में ज्ञान मिलता है, गुरु ऐसा ज्ञान देता है जो पुस्तकों और कहानियों में नहीं होता | ज्ञान ऐसे शिष्य को मिलता है जिसमे ज्ञान अर्जित करने की इच्छा, लगन और योग्यता होती है जिन शिष्यों में योग्यता नहीं होती गुरु उन पर समय नष्ट नहीं करता | योग्यता कर्मों के आधार पर होती है, शिष्य में योग्यता होने पर गुरु उस की उन्नति करने का अवसर नहीं छोड़ता | गुरु द्वारा बताये मार्ग पर सभी शिष्य नहीं चलते, अधिकतर लोग अपनी आवश्यकता, सुविधा और परिस्थिति के अनुसार कार्य करते है , जो लोग गुरुमार्ग पर चलते है उन्हें लोक-परलोक में कोई कष्ट नहीं होता |

गुरु द्वारा शिष्य को दिए जाने वाले ज्ञान से ही गुरु के अपने अध्यात्मिक स्तर का पता चल जाता है कि गुरु स्वयं निराकार से कितना जुड़ा हुआ है और उसमे कितनी योग्यता है, सच्चा गुरु आधा-अधूरा ज्ञान नहीं देता वह अपने शिष्य को पूर्ण ज्ञान देता है | शिष्य की अपनी रुचि और योग्यता के अनुसार उसकी अध्यात्मिक उन्नति करना और उसका सही मार्गदर्शन करना गुरु का मुख्य कार्य है | गुरु अपने शिष्य को मन और मस्तिष्क दोनों को काबू करने का गुर सिखाता है जिससे शिष्य सभी प्रकार की परिस्थितियों में भयभीत, भ्रमित या असहाय ना हो, शिष्य में धैर्य और नम्रता किसी विवशता के कारण नहीं हो अपितु यह उसके स्वभाव में हो, शिष्य में प्रशंसा करने और प्रशंसा सुनने की आदत नहीं हो, शिष्य अपने भाग्य पर निर्भर ना होकर अपने कर्म पर ध्यान दे और उसकी कर्मपूँजी इतनी हो की बिना मांगे ही आवश्यकता के अनुसार उसे सब कुछ अपने आप मिलता जाये, शिष्य संसार में रहते हुए भी किसी सांसारिक वस्तु या व्यक्ति से इतना ना जुड़े कि उसके मोक्ष का मार्ग कठिन हो जाए | सांसारिक ज्ञान तो सभी को होता है परन्तु गुरु सांसारिक विपत्तियों के साथ साथ अध्यात्मिक स्तर को विकसित करता है जिसके कारण शिष्य सदैव अपने गुरु का ऋणी रहता है, इस ऋण से मुक्त होने के लिए शिष्य अपने गुरु को गुरुदक्षिणा देता है | गुरु द्वारा मिला ज्ञान अमूल्य होता है फिर भी शिष्य बड़ी श्रद्धा से गुरु को अपनी सामर्थ्य के अनुसार भेंट देता है, कई बार तो शिष्य अपना शेष जीवन ही गुरु की समर्पित करके स्वयं को धन्य समझते है, आज के समय में ऐसे गुरु और शिष्य दोनों की कमी है |

ज्ञान की प्राप्ति से केवल ज्ञानी बना जा सकता है जबकि गुरु के पास आध्यात्मिक ज्ञान होने के साथ साथ देवी देवताओं का साथ और निराकार की कृपा भी होती है | सांसारिक ज्ञान और आध्यात्मिक ज्ञान में बहुत बड़ा अंतर है, ज्ञानी को आध्यात्म का ज्ञान हो यह आवश्यक नहीं है और गुरु को सांसारिक ज्ञान हो यह भी आवश्यक नहीं है | सांसारिक उन्नति के लिए सांसारिक ज्ञान का होना आवश्यक है और आध्यात्मिक उन्नति के लिए अध्यात्मिक ज्ञान होना चाहिए | कभी कभी ज्ञानी केवल ज्ञान तक सीमित रह जाते है क्योंकि उनके पास वो कृपा नहीं होती जिससे वो निराकार के रहस्य को समझ सके | आवश्यकता से अधिक ज्ञान भ्रम का कार्य करता है जो व्यक्ति को निराकार और उसकी कृपा से वंचित रखता है | गुरु के पास कृपा नामक वो चाबी होती है जिससे कोई भी सांसारिक या अध्यात्मिक ताला खुल सकता है | यदि गुरु चाहे तो अपने शिष्य को वह दिव्य चाबी पाने के योग्य बनने का मार्ग बता सकता है | समस्या तब आती है जब व्यक्ति स्वयं ही वह चाबी खोजने या बनाने का प्रयत्न करता है क्योंकि निराकार का नियम है कि कृपा रूपी चाबी केवल गुरु के द्वारा ही मिलती है | आधा अधूरा ज्ञान अंधकार के सामान है जो व्यक्ति को और भ्रमित करता है, ऐसे में कृपा और आशीर्वाद प्रकाश का कार्य करते है | गुरु कितना भी ज्ञान दे वो कम समझना चाहिए क्योंकि जो इतना दे सकता है उसके स्वयं पर कितनी और अधिक ईश्वरीय कृपा होगी | कभी भी यह नहीं समझना चाहिए कि मुझे गुरु ने सारा ज्ञान दे दिया और मुझ पर भी गुरु जितनी ही कृपा हो गयी है |

गुरु द्वारा एक गुप्त ज्ञान यह भी दिया जाता है कि निराकार की कृपा कभी भी दो लोगो पर एक सामान नहीं होती, संसार में दिखने वाला सभी कुछ एक दुसरे से भिन्न है जैसे पहाड़, नदिया, पेड़ पौडे, जीव जंतु इत्यादि | निराकार के स्वभाव में नक़ल करना नहीं है, एक बार जो बन गया वह दोबारा नहीं बनता, मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो दूसरों को देख कर आकर्षित होता है और नक़ल करने को विवश हो जाता है |

गुरु और शिष्य का अटूट सम्बन्ध है जो एक बार स्थापित हो जाये तो फिर कई जन्मों तक चलता है, जिस शिष्य के कर्म बहुत अधिक बलवान हों और उन कर्मो का फल अपने आप मिलना हो तो ऐसे शिष्य को ज्ञान देने गुरु स्वयं शिष्य के पास जाते है, जबकि साधारण कर्मों वाले शिष्यों को गुरु की खोज करनी पड़ती है | शिष्य कई प्रकार के होते है इनमे भक्त शिष्य होते है जो गुरु से दूर रहे या पास रहे इनके मन में गुरु के लिए श्रद्धा और भक्ति होती है, ये गुरु के वचनों पर चलना और गुरु की सेवा करके अपना जीवन बिताने को ही सब कुछ मानते है और अपना तन, मन, धन गुरु के लिए लगा देते है, गुरु के साथ या पास रहकर इन्हें अलौकिक आनंद की अनुभूति होती है | ऐसे शिष्यों से गुरु को आत्मिक प्रेम होता है |

कुछ शिष्य चतुर होते है, उन्हें गुरु की याद तभी आती है जब जीवन में कोई समस्या या दुःख हो, काम निकलने पर ऐसे शिष्य गुरु से दूर रहना ही पसंद करते है ऐसे शिष्य सांसारिक सुख सुविधाओं के लिए ही जीते है उन्हें मोक्ष या निराकार में कोई रुचि नहीं होती, ये समझते है कि गुरु थोड़ी सी सेवा करने में ही इनका कल्याण हो जायेगा क्योंकि गुरु ने अपने स्वार्थ के लिए नहीं इनके लिए जन्म लिया है | ऐसे शिष्यों को गुरु केवल सांसारिक वस्तुओं को पाने का मार्ग बताते है |

कुछ अन्य शिष्य ज्ञानी होते है हालाँकि इनकी गिनती बहुत कम होती है जो गुरु की रमज़ को समझते है, जिनको यह ज्ञान होता है कि गुरु के क्रोध या डांट, फटकार में भी उनका क्या लाभ है, ऐसे शिष्य यह जानते है कि गुरु अपने क्रोध या फटकार द्वारा उनके जाने अनजाने हो गए कुकर्मों का प्रभाव समाप्त करने में उनकी सहायता करके उनमे और अधिक अध्यात्मिक विकास होने की योग्यता बना रहे है । ऐसे शिष्यों के अध्यात्मिक विकास के लिए गुरु उन पर अधिक मेहनत करता है |

मोक्ष प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को निराकार का ज्ञान होना आवश्यक है और निराकार का ज्ञान होने के लिए व्यक्ति का अध्यात्मिक होना आवश्यक है, आध्यात्मिक होने के लिए पूर्ण गुरु का आशीर्वाद और कृपा होनी अति आवश्यक है |

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मेरे विचार

मोक्ष का ज्ञान तभी हो सकता है जब आत्मा के जन्म का ज्ञान हो |

संसारज्ञान – जीवन से मृत्यु का ज्ञान है और निराकारज्ञान – मृत्यु से जीवन का ज्ञान है |

सच को नहीं झूठ को खोजने का प्रयास करो, यदि झूठ का ज्ञान हो गया तो निराकार का ज्ञान अपने आप हो जाएगा |

जीवन में परिवर्तन चाहते हो तो क्या करना है पर नहीं,  क्या नहीं करना है पर अधिक ध्यान दो |

संसार का सबसे बड़ा अंधविश्वास है की निराकार किसी साकार रूप में मिलेगा |

संसार का सबसे कठिन कार्य अपने मन को समझाना है |

अपने मन को सीखने और खोजने में इतना व्यस्त कर दो कि इसे पाप करने का समय या अवसर ही ना मिले |

अपने मन को इतना टिकाओ कि आँखे खुली होने पर भी ध्यान निराकार में लगा हो |

किसी का मन भटकाना ऐसा पाप है जिसका कोई प्रायश्चित नहीं है |

जो भाग्य में है उसके पीछे भागने की आवश्यकता नहीं है और जो भाग्य में नहीं है उसके पीछे भागने का कोई लाभ नहीं है |

कर्मपूँजी इतनी हो कि बिना मांगे ही सब कुछ मिल सकता हो परन्तु कुछ मांगने की आवश्यकता ना हो |

ईर्ष्या से मुक्त होने के लिए दूसरों के कर्मों पर ध्यान मत दो |

स्वयं की प्रशंसा सुनना, अहंकार को निमंत्रण देना है |

धार्मिक से अध्यात्मिक होने में कई जन्म लगते है, अपनाना धर्म है और त्यागना आध्यात्म है |

ज्ञान होने और कृपा होना दोनों में बड़ा अंतर है |

उस वस्तु के पीछे मत भागो जिसके बिना गुज़ारा चलता है |

सच्चा गुरु वह है जो गुर सिखाए, और सच्चा शिष्य वह है जो गुरु ना बनना चाहे |

किसी के आध्यात्मिक ज्ञान से उसके गुरु के स्तर का पता चलता है |

गुरु के पास वह मास्टर चाबी होती है जो देवी देवताओं के पास भी नहीं होती |

बातें आना और निराकार का ज्ञान होना दोनों में बड़ा अंतर है |

भ्रम और भय से मुक्ति केवल ज्ञान द्वारा होती है |

सही मार्ग दिखाने से बढकर कोई पुण्य नहीं है |

कोई भी कर्म सही या गलत नहीं होता, सही या गलत होते है कर्म के परिणाम |

हे ईश्वर ! मुझे शून्य कर दो, जिसके साथ भी लगूं वह दस गुना बढ़ जाए |

 

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Vijay Batra : Karmalogist

Founder : शून्यपंथ – A Spiritual Community.
Chairman : College of Spiritual Education.
Secretary : Serve & Care Charitable Society.
Author of शून्यसंहिता :  विश्व की एकमात्र धर्मरहित आध्यात्मिक संहिता !