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Napoo Yantra

Napoo Yantra is used for protection against negative energy, evil eye and black magic. It provides excellent relief from inauspicious situations and sufferings.

The Yantra must be put at the main entrance of the home to protect the family and it can be used in bedrooms when negativity affects personal relationships.

People in India and abroad have been benefitted through Napoo Yantra and are living a safe life without any negative energy problems. Napoo Yantra can be collected for free of cost from Napoo Foundation office.

Important note: Napoo foundation is the sole provider of Napoo Yantra. Copying it for money collection or advertisement will be considered as an offence.

Napoo Foundation

Founder : Vijay Batra Karmalogist

Paschim Vihar, New Delhi, India

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मंत्रजाप से बढ़ता है गुस्सा ! – Karmalogist Vijay Batra Spiritual Education, Delhi

मंत्रजाप से बढ़ता है गुस्सा !

मान्यता है कि मंत्रजाप अथवा किसी पूजा पाठ करने से मन निर्मल और शांत रहता है इसीलिए अधिकतर लोग अपनी दिनचर्या किसी मंत्रजाप या पूजा पाठ से आरम्भ करते है | यह भी कहा और माना जाता है कि मंत्र पढने से घर में प्रेम और सुख समृद्धि का वास होता है |

प्रतिदिन अनेकों लोग मुझे अपनी समस्याओं के समाधान के लिए व्यक्तिगत रूप से मिलते है जो यह कहते है कि उनके घर में अधिक मंत्रजाप, नाम उच्चारण और पूजा पाठ होता है फिर भी परिवारजनों में गुस्सा है जिससे घर का वातावरण नकारात्मक और अशांति वाला है |

मेरे निजी अनुभव से मंत्रजाप के बाद भी गुस्से और अशांति के दो मुख्य कारण होते है,

  • लक्ष्यहीन मंत्रजाप और पाठ पूजा करना |

  • मंत्रजाप वाले स्थान पर नकारामक शक्ति का प्रभाव होना |

कुछ लोग बिना किसी लक्ष्य के कोई मंत्रजाप अथवा पूजा को सालों तक करते रहते है | इस बात का उन्हें स्वयं भी पता नहीं होता है कि किस मंत्र, नाम या पाठ-पूजा को कितने समय के बाद नहीं करना चाहिए या उसे विराम देना अति आवश्यक है |

सभी लोग यह जानते है कि कोई भी मंत्र, नाम, पाठ इत्यादि उच्चारण करने से ऊर्जा का प्रवाह होता है परन्तु लगभग सभी लोगों को यह ज्ञान नहीं है कि मंत्र, नाम इत्यादि पढने से जो ऊर्जा बनती है उसका सकारात्मक प्रयोग कैसे किया जाता है |

किसी मंत्रजाप से उत्पन्न हुई ऊर्जा का सकारात्मक प्रयोग नहीं कर पाने के कारण ही उसका नकारात्मक प्रभाव मंत्रजाप करने वाले व्यक्ति और उसके घर पर पड़ता है जिसका पहला मुख्य लक्षण गुस्सा आना और अशांति होना है |

मंत्रजाप से पहले लक्ष्य होना और मंत्रजाप से बाद इसकी ऊर्जा का सकारात्मक प्रयोग पता होना अति आवश्यक है अन्यथा मंत्रजाप से किसी बड़ी हानि होने की संभावना भी होती है क्योंकि आवश्यकता से अधिक मंत्रजाप से उत्पन्न ऊर्जा, पारिवारिक सुख से वंचित करने में सक्षम होती है |

इस बात का ज्ञान भी सभी को नहीं है कि नकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होने पर बुरी नज़र, टोना टोटका, भूत प्रेत इत्यादि को अधिक बल मिलता है | लोगों को ईश्वर से यह शिकायत भी रहती है कि अधिक मंत्रजाप या पूजा पाठ करके भी नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव समाप्त नहीं होता है |

इस बात पर सभी को विशेष ध्यान देना चाहिए कि दैनिक क्रियाओं में कैसे कर्म करना चाहिए और कैसे कर्म नहीं करना चाहिए | कहीं ऐसा तो नहीं कि मंत्रजाप या पाठ-पूजा के कारण ही समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं |

आध्यात्मिक ज्ञान हेतू संपर्क करें |

Karmalogist Vijay Batra

Founder of ShunyaPanth

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उपायों का फल क्यों नहीं मिलता ? Karmalogist Vijay Batra

उपायों का फल क्यों नहीं मिलता ?

संसार का प्रत्येक व्यक्ति अपनी समस्याओं के समाधान के लिए अनेकों उपाय करता है परन्तु इनमे अधिकतर उपायों का कोई फल नहीं मिलता जिसके कारण किसी एक समस्या के लिए व्यक्ति बार-बार उपाय करता रहता है | कहा जाता है कि संसार में विश्वास से किया गया कोई भी कर्म निष्फल नहीं जाता, यदि ऐसा है तो फिर उपायों का फल क्यों नहीं मिलता क्योंकि हर उपाय पूरे विश्वास और श्रद्धा से किया जाता है |

अपना मन समझाने के लिए व्यक्ति स्वयं को अनेकों तर्क देता है जैसे इसी में कुछ भलाई होगी, ईश्वर को यही मंज़ूर होगा, अभी समय नहीं आया, इत्यादि | अपने मन को बहलाने से समस्या का समाधान नहीं होता, किसी इच्छित कार्य का पूरा होना समस्या का समाधान है | आइये इसे विस्तार से समझते है कि उपायों का फल क्यों नहीं मिलता |

किसी उपाय का लाभ होना या नहीं होना इस बात पर भी निर्भर करता है कि उपाय बताने वाले व्यक्ति को उपायों का कितना ज्ञान है | यदि उसके उपायों का आधार अपने जीवन काल में सुनी-सुनाई बातें या सस्ती पुस्तकीय जानकारी है तो ऐसे अधिकतर उपायों का लाभ नहीं मिलता है | उपाय का लाभ तभी मिलता है जब व्यक्ति को समस्या का कारण और उपाय के तर्क एवं वास्तविकता का ज्ञान हो |

यदि उपाय का तार्किक ज्ञान हो तो बड़ी से बड़ी समस्या के लिए छोटा सा उपाय भी काफी है | पूर्ण तार्किक ज्ञान होने के लिए किसी गुरु द्वारा दिव्यज्ञान मिलना या अपना निजी शोध होना अति आवश्यक है | हर व्यक्ति अपने आप को गुरु कहलाने के लिए अधिक से अधिक उपायों को तोड़-मरोड़ कर बताते है जिसके परिणाम से साधारण व्यक्ति के कार्य पूरे नहीं होने के साथ-साथ धन और समय हानि भी होती है |

मेरे पास ऐसे अनेकों लोग आते है जो अपने ठगे जाने की कहानियाँ सुनाते है, जिन्होंने अनेकों उपायों को श्रद्धा और विश्वास से किया परन्तु उनकी समस्याएं जस की तस रही | उपायों का फल नहीं मिलने पर अनेकों लोग उपायों और ईश्वर पर विश्वास करना बंद कर देते है | उपायों के सम्पूर्ण ज्ञान नहीं होने पर भी लोग दूसरों को अधिक से अधिक उपाय बता देते है जबकि ऐसे उपायों को करने से अधिकतर लोगो को केवल हानि ही होती है |

यदि आपको कोई भी व्यक्ति ऐसा उपाय बताता है जिसके तर्क का ज्ञान उसे नहीं है या वह व्यक्ति यह नहीं बता सके कि उपाय सकारात्मक परिणाम कैसे देगा तो ऐसे उपायों को बिलकुल भी नहीं करे, नहीं तो समस्या समाप्त होने के स्थान पर आपकी समस्या बढ़ सकती है | पिछले कई सालों में मैंने अनेकों शिष्यों को उपायों का तर्कज्ञान को सिखाया है जो मेरे निजी शोध का सार है | भारत और विदेशों में रहने वाले हजारों लोगो को उपायों के तर्कज्ञान होने से उनका धन और समय की हानि होने से बचाव भी हुआ है |

आपको कौन सा उपाय करना चाहिए और कौन सा उपाय नहीं करना चाहिए इसकी सम्पूर्ण जानकारी के लिए संपर्क करे, इसके अतिरिक्त किसी भी उपाय से सम्बंधित तर्कज्ञान  के लिए भी आप मुझे संपर्क कर सकते है |

Karmalogist Vijay Batra

Founder of ShunyaPanth

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Change Your Destiny Through Karma Education !

Change your destiny through Karma education !

Earlier, there were many unanswered questions without satisfactory answers like :

  • Why some are born poor and some rich?
  • Why some are ugly and some beautiful?
  • Why some are healthy and some are born disabled?
  • Why some are suffering and some enjoying luxurious life?
  • Why humans suffer when everything is done by God?
  • Why some get no benefits of their hard-work and some get everything without doing anything?
  • Why some are happy with nothing and some sad with everything?
  • Why certain things are sin for some people not for everyone?
  • Why negativity works stronger than positivity? Etc.

 

But now, we have logical answers for all such questions except saying it’s all by chance.  We have been observing that nothing is happening around just by chance. Maximum people of the world are confused about things like virtue-sin and right-wrong. Superstitions and stereotype beliefs cause immense emotional harm to the Karma of people. They need the right knowledge to eradicate and counter such superstitions and beliefs.

Karmalogist offers you an innovative learning called Karma education which will help you  to improve daily Karmas which are incorrectly performed because of superstitions and old beliefs. Karma Education by Karmalogist cannot be found in legendary and recognized books. This is quite different from other orthodox teachings and rituals and not available elsewhere.

 

 

About Karma and Spiritual Education :-

Spiritual practice is a very good way for spiritual growth, but, before practicing you must have the right wisdom to know if you will achieve your spiritual target through your practices. Spiritual practices are incomplete if you don’t have logic based wisdom of your spiritual queries.  To get something different and unique you need to learn different from legendary books.

If you are doing same as others, you will also be confused like them in your spiritual journey because your available information is incomplete. You can experience invisible divine power only when you have complete academic knowledge and guidance to develop your abilities.

Mr. Vijay Batra Karmalogist has been teaching Karma and Spiritual Education since many years,  which gives logic based answers to questions that are considered unanswerable such as :

  • Religion and Spirituality ●The theory of formless presence of God ●Birth of Soul and Types of Souls ● The working and types of Karmas. The factors affecting the consequences ●Real Meaning of Salvation and technique to attain it ●how to get rid of orthodox beliefs, fears, confusions etc. ●Worldly problems and circumstances ●Evil spirits and negativity ●Vision to recognize sin-virtue and right wrong according to spirituality.
  • No religious knowledge required
  • No books/writings/ notes required
  • No orthodox teachings
  • No traditional Practices

Individual facility is also available.

Call to join +91 – 9811677316

 

 

 

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गुरु की पहचान – Vijay Batra Karmalogist

गुरु की पहचान

लेखक : विजय बतरा Karmalogist

गुरु शब्द में बहुत सारी आशा और सकारात्मकता है, ऐसा कहा भी जाता है कि जिसके सिर पर उसके गुरु का हाथ है उसको भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है | गुरु होने पर व्यक्ति को लगता है कि उसके सिर पर ऐसी छत्रछाया है जिसके कारण वह सभी प्रकार की समस्याओं और अनहोनियों से सुरक्षित है, उसके सभी कार्य निर्विघ्न(बिना रूकावट) हो जायेंगे और उसके द्वारा जाने-अनजाने हो गए सभी पापों को गुरु क्षमा करेंगे और उसे बुरे कर्मों के दंड का सामना नहीं करना पड़ेगा |  गुरु पर विश्वास करने वाले व्यक्ति की श्रद्धा देवी देवताओं पर होने वाली श्रद्धा से अधिक होती है क्योंकि उसके अंतर्मन में यह निश्चित होता है कि जो कार्य देवी देवता भी नहीं कर सकते वह मेरा गुरु कर सकता है इसका एक कारण यह भी है कि देवी देवता उसके सामने नहीं है जबकि गुरु से वह अपने मन की बात करके अपनी इच्छा या समस्या का समाधान पा सकता है | प्रत्येक व्यक्ति की अपनी श्रद्धा और विश्वास पर निर्भर करता है कि उसके मन में उसके गुरु का क्या स्तर है | जब व्यक्ति की श्रद्धा, विश्वास और उसके गुरु का स्तर तीनो मिल जाते है तो संसार का हर असंभव कार्य बड़ी सरलता से हो जाता है |

ऐसे तो संसार में हर व्यक्ति गुरु और शिष्य दोनों है क्योंकि सभी लोग एक दूसरे को प्रत्यक्ष-अप्रयक्ष रूप से बहुत कुछ सिखाते है, फिर भी प्रत्येक व्यक्ति एक ऐसे गुरु की तलाश में है जो उसे सांसारिक और अध्यात्मिक ज्ञान देकर कृतार्थ करे | अनेक प्रकार की  मान्यताओं और अंधविश्वासों के कारण आज संसार में सच्चे गुरु की पहचान होना या सच्चे गुरू का मिलना असंभव सा लगता है परन्तु ऐसा नहीं है कि सच्चे गुरु संसार में नहीं है यदि ऐसा होता तो आज संसार में धर्म या आध्यात्म की कोई बात ना हो रही होती | यह एक अलग बात है कि साधारण व्यक्ति को ज्ञान की कमी और गुरु के बारे में उसकी जानकारी के कारण भ्रम की स्थिति बनी रहती है क्योंकि किताबों में गुरु के बारे में जो लिखा हुआ है वर्तमान गुरु उसके बिलकुल विपरीत दिखता है | वेशभूषा और किताबी बातों द्वारा स्वयं को गुरु बता कर दिशाहीन और भयभीत करने वाले गुरु हर स्थान पर मिलते है जिनके पास स्वयंज्ञान नहीं है, ऐसे लोगो के कारण ही धर्म(नियम) में इतना अंधविश्वास मिश्रित हो चुका है कि अब साधारण व्यक्ति धार्मिक या आध्यात्मिक होने से भी डरता है | सभी को भली प्रकार से पता है धर्म की आड़ में साधारण व्यक्ति की श्रद्धा और विश्वास का किस प्रकार से शोषण होता है |

प्राचीनकाल की तुलना में आज का व्यक्ति अधिक समझदार है और इसके पास जानकारी के लिए इन्टरनेट और पुस्तकों के अथाह सागर है जिसमें उसके सभी प्रश्नों के उत्तर है परन्तु परिवार और बाहरी जानकारी के अनुसार उसके मन में जो निस्वार्थ और कृपालु गुरु की छवि है वैसा गुरु उसे कहीं नहीं मिलता जिसके कारण आज का व्यक्ति सही-गलत और पाप-पुण्य को लेकर बहुत अधिक भ्रमित और भयभीत है | परिवार से मिले धर्म-संस्कारों पर चलने पर व्यक्ति अपने आपको पापी और गुनाहगार समझता है, हर कार्य करने के साथ वह भय और भ्रम की स्थिति में रहता है कि कहीं उसके द्वारा किया कोई कार्य पाप ना हो या किसी की आत्मा को कष्ट ना हो जाये जिससे मुझे दंड में नरक भुगतना पड़े | स्वर्ग की लालसा और नरक का भय सभी धार्मिक व्यक्तियों में है, परन्तु फिर भी अपनी सुविधा और आवश्यकता को पूरी करने के लिए व्यक्ति धर्म(नियम) की उलंघना करता है | सही मार्ग से व्यक्ति का मन नहीं भटके इसीलिए ही सभी को एक सच्चे और निस्वार्थी गुरु की आवश्यकता है |

सभी व्यक्तियों को धर्म में यह बताया जाता है कि मनुष्य का जन्म चौरासी लाख प्रकार के जन्मो के बाद मिलता है मनुष्य जन्म में जो भी पाप किये होते है उसके बदले चौरासी लाख प्रकार के जीव जंतुओं के जन्म मिलते है । केवल गुरु इस बात का ज्ञान देता है कि जब पिछले मनुष्य जन्म के पापों के बदले चौरासी लाख प्रकार के जन्मो का भुगतान कर लिया है तभी यह जन्म मिला है तो मनुष्य बनते ही अपने आप को पिछले जन्मो के कर्मो का पापी मानना मूर्खता व कायरता है और संसार में भयभीत होकर नहीं भयमुक्त होकर रहना है |

गुरु द्वारा यह भी समझाया जाता है कि सांसारिक जीवन के लिए धर्म अच्छा है, यदि व्यक्ति धर्म से चलेगा तो किसी के साथ कोई छल-कपट नहीं करेगा जिससे पापकर्म कम बनेंगे और उसके जीवन में कर्मफल से आने वाली समस्याओं का अवसर कम होगा, परन्तु धर्म निराकार को समझने के लिए नहीं है । निराकार को तभी जान सकते है जब सभी सांसारिक वस्तुओं, संबंधों, आदतों, भावनाओं, कर्मों को छोड़ कर शून्य की अवस्था आयेगी । निराकार का धर्म से कोई लेना देना नहीं है, धर्म मनुष्य ने बनाया है जिससे आत्मा और शरीर को  नियम में चलने का अभ्यास बना रहे । संसार में साकार (दिखने वाला सभी कुछ) से सम्बंधित नियम धर्म है और किसी कर्म, वस्तु, व्यक्ति, नियम पर निर्भर रहे बिना निराकार से जुड़े रहना आध्यात्म है । धर्म में स्थान, समय, नियम, व्यक्ति इत्यादि को महत्त्व दिया जाता है जबकि आध्यात्म में किसी भी व्यक्ति, स्थान, वस्तु और नियम का कोई महत्त्व नहीं है, शून्य को समझना और शून्य होना ही आध्यात्म है । धर्म और आध्यात्म में यही अंतर है कि धर्म भययुक्त है और आध्यात्म भयमुक्त है, व्यक्ति ने धार्मिक बनना है या अध्यात्मिक बनना है यह उसकी स्वयं की इच्छा और उसे ज्ञान देने वाले गुरु पर निर्भर करता है । केवल गुरु की शरण में रह कर ही यह सीखा जा सकता है कि धर्म की बैसाखी का सहारा लेकर निराकार को समझना असंभव है क्योकि धर्म का त्याग करके ही आध्यात्मिक बना जा सकता है ।

ऐसा ज्ञान एक सच्चे गुरु द्वारा ही मिलता है कि कर्मों की पूँजी केवल आत्मा बनती है शरीर से कोई कर्म नहीं बनता और उनके फल शरीर द्वारा भोगे जाते है, वह शरीर मनुष्य का हो या किसी जीव जंतु का हो शरीर भोगने के लिए है जबकि प्राय: यह कहा जाता है कि व्यक्ति शरीर से जो भी करता है उसी का फल भुगतना पड़ता है |  धार्मिक स्थान पर जाकर भी व्यक्ति की आत्मा (ध्यान/विचार) घर पर है तो वहां जाने का कोई लाभ नहीं है बिना आत्मा के कर्म करना शरीर को कष्ट देना है | पिछले मनुष्य जन्म के पाप भी व्यक्ति ने चौरासी लाख प्रकार के जन्म लेकर ही भोगे थे तो आज व्यक्ति किस बात से डरता है । आज प्रत्येक व्यकि अपनी क्षमता और उपलब्धता के अनुसार भ्रम और भय से मुक्ति की खोज में लगा हुआ है परन्तु भ्रम और भय से  मुक्ति तभी हो सकती है जब व्यक्ति के पास ऐसा गुरु हो जो उसे सही ज्ञान द्वारा अन्धविश्वास और सुविधा या दूसरों से लाभ लेने के लिए बनी मान्यताओं से मुक्त कर सके |

धर्म संसार के लिए है मनुष्य ने अपनी सुविधा के लिए अलग अलग धर्म बनाये है, इसमें व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक धर्म है, इन धर्मों का पालन कैसे करना है यह सिखाना गुरु का कार्य है | आध्यात्म आत्मा के लिए है आत्मा द्वारा किए कर्म का फल कैसा मिलता है और उससे कैसा बचा जा सकता है या बताना और समझाना भी गुरु का ही कार्य है | धर्म और अध्यात्मिक में व्यक्ति का मस्तिष्क बहुत अधिक उलझ चुका है इसलिए वह सही और गलत का निर्णय करने में सक्षम नहीं है इसी कारण उसके मन में अनेकों प्रश्न है जैसे : गुरु की आवश्यकता क्यों है ? गुरु का क्या कार्य है ? गुरु कैसा होना चाहिए ? गुरु कब और कहाँ मिलेगा ? गुरु की पहचान क्या है ? गुरु की महिमा देवी देवताओं से अधिक क्यों है ? गुरु के बिना गति क्यों नहीं है ? इत्यादि |

व्यक्ति के दैनिक जीवन में बहुत सारी ऐसी समस्याएं और परिस्थितियां आती है जिनके समाधान या मार्गदर्शन के लिए उसे एकदम सही उत्तर की आवश्यकता होती है हालांकि अधिकतर उत्तर व्यक्ति को स्वयं पता होते है फिर भी भ्रम और भय की स्थिति में व्यक्ति को किसी ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता होती है जिस पर ईश्वर की कृपा हो, जिसके पास कर्म और कर्मफल को बदलने/बदलवाने का अधिकार हो, जिसे सांसारिक और अध्यात्मिक ज्ञान हो, जिसका अपना कोई स्वार्थ नहीं हो, जो भूतकाल से भविष्यकाल तक को देख सकता हो और उसी अनुसार निस्वार्थ(बिना लालच) ऐसी युति(गुर) सिखाये जिससे उसकी सभी समस्याओं और परिस्थियों पर विजय हो जाए | सच्चा और पूर्ण गुरु वही है जो अपने शिष्य को ऐसी युति(ऐसा गुर) सिखाये जो उसे साकार संसार में और देह छोड़ने के बाद के रहस्मयी संसार में काम आयें |

गुरु की पहचान

गुरु कही भी मिल सकता है, यह आवश्यक नहीं है कि गुरु किसी विशेष वेशभूषा में ही होगा, वेशभूषा का प्रयोग निजी लाभ के लिए मूर्ख बनाने या दिशाहीन करने में भी किया जा सकता है सच्चे गुरु को वेशभूषा या दिखावे में कोई रुचि नहीं होती, ना ही वह अपनी प्रशंसा सुनने का इच्छुक होता है | साधू की वेशभूषा भगवा रंग की होती है इसका अर्थ यह नहीं है कि भगवा पहनने वाले सारे लोग साधू विचारों के होते है इनमे स्वार्थी और कपटी लोग भी हो सकते है | साधू का भगवा रंग धारण करने के पीछे गूढ़ वैज्ञानिक कारण है जिसका स्वयं साधुओं को भी पता नहीं है | सूर्य का रंग भगवा है, प्रात:काल सूर्य उदय होने पर परिवार के सदस्य एक-दूसरे से दूर होने लगते है पति-पत्नी अपनी आजीविका के लिए और बच्चे शिक्षा इत्यादि के लिए बाहर जाते है | सूर्य अस्त के बाद परिवार फिर से घर में एकत्रित हो जाता है, इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि सूर्य पारिवारिक सुख से वंचित करता है साधू के भगवा पहनने का अर्थ यह है कि इस व्यक्ति ने पारिवारिक सुखों का त्याग करके भगवा धारण कर लिया है और अब पारिवारिक जीवन नहीं चाहता, बाकि का जीवन सांसारिक वस्तुओं और लोगो से दूर रहेगा | प्राय: लोग आशीर्वाद पाने के लिए साधू को आवश्यकता से अधिक सुविधा उपलब्ध करा कर उनका मन भटकाते है, सुख सुविधा को देखकर सच्चे साधू का मन भी संसार की और आकर्षित होने लगता है,  ऐसा करके वह लोग अपने पाप कर्म की पूँजी जमा करते है क्योंकि सुविधाओं को भोगने पर साधू अपने लक्ष्य से भटक कर निराकार से दूर हो जाता है |

सच्चे गुरु की पहचान का पहला लक्षण यह है कि गुरु किसी वेशभूषा या ढोंग के अधीन नहीं है और उसके चेहरे पर सूर्य के सामान तेज दिखता है और उसकी छठी इंद्री पूर्णत: विकसित होती है जिसके द्वारा वह भूत, वर्तमान और भविष्य को देख पाता है | सच्चा गुरु ज्ञान देने में प्रसन्न होता है ज्ञान को छुपाने वाला या भ्रमित करने वाला सच्चा गुरु नहीं होता | यह बात भी सभी जानते है कि संसार में जीवित रहने के लिए धन की आवश्यकता है, अकारण आवश्यकता से अधिक धन का मांगना गुरु के लालची और स्वार्थी होने का चिन्ह है , गुरु को स्वार्थी होने का अधिकार नहीं है स्वार्थ संसार के लिए है अध्यात्म में स्वार्थ का त्याग होना अति आवश्यक है जिसका सही ज्ञान सच्चे गुरु द्वारा ही मिलता है |

किसी व्यक्ति में गुरु वाले गुण होने के लिए अच्छे कर्मों की पूँजी होना अति आवश्यक है और जब अच्छे कर्मों की पूँजी गुरु के खाते में है तो उसे धन और अन्य सांसारिक वस्तुओं के पीछे भागने की आवश्यकता नहीं होती बल्कि अच्छे कर्मों के प्रभाव से उसकी आवश्यकता के अनुसार वस्तुएँ गुरु तक अपने आप पहुँचती है | जब कर्मों की पूँजी होती है तो व्यक्ति में इतना संतोष और नम्रता आ जाती है कि धन की पूँजी के लिए मन विचलित नहीं होता | गुरु कहलाने के बाद गुरु का यह दायित्व है कि वह अपने शिष्यों और साधारण व्यक्तियों का सही मार्गदर्शन करे यदि गुरु ज्ञान का प्रयोग धन अर्जित करने या किसी निजी स्वार्थ के लिए करता है तो गुरु के लिए क्षमा नहीं होती और उसे साधारण व्यक्ति से सौ गुना अधिक दंड भोगना पड़ता है क्योंकि गुरु को पाप-पुण्य का ज्ञान होता है | साधारण व्यक्ति के गलती करने पर उसके लिए क्षमा का अवसर और विकल्प है परन्तु गुरु जिसे धर्म और आध्यात्म दोनों की समझ है उसके लिए साधारण व्यक्ति से कही अधिक दंड भुगतना पड़ता है क्योंकि उसके पास साधारण व्यक्ति से अधिक ज्ञान है |

गुरु अपने शिष्य को धर्म(सांसारिक नियम) और आध्यात्म(निराकार), दोनों का अंतर और निराकार को समझने का सरल मार्ग भी बताता है, अधिकतर लोग स्वयं को धार्मिक और आध्यात्मिक दोनों समझते है जबकि ऐसा नहीं है | धर्म नियम है जो स्वयं और संसार को व्यवस्थित करने में सहायक होता है, धर्म संसार के लिए है सभी संबंधों के लिए अलग अलग धर्म(नियम) है जैसे गुरुधर्म, शिष्यधर्म, पिताधर्म, माताधर्म, भाईधर्म, बहनधर्म, मित्रधर्म, राजधर्म, मंत्रीधर्म, नागरिकधर्म, इत्यादि इत्यादि |  धर्म (नियम) बहुत सारे है इसलिए व्यक्ति आवश्यकता और विवशता के कारण अपनी सुविधा के अनुसार नियमों और अपनी मान्यताओं को समय समय पर बदलता रहता है जबकि आध्यात्म सभी संबंधों, नियमों से मुक्त होकर निराकार का ज्ञान होने की अवस्था है आध्यात्म का सम्बन्ध आत्मा से है इसलिए इसमें कोई नियम नहीं है, ना ही इसमें कही कोई असुविधा है कि इसको बदलने की आवश्यकता पड़े |

गुरु केवल देने(दूसरो) के लिए है गुरु द्वारा वचन और कर्म व्यक्ति के कल्याण में काम आते है, अपने लिए लेने वाला गुरु नहीं होता, गुरु जिसे सांसारिक वस्तुओं की चाह नहीं होती, गुरु का सम्बन्ध आत्मा से है शरीर से नहीं, जो धन और जाति के कारण भेदभाव नहीं करता | गुरु जो प्रत्येक शिष्य की प्रेम, विश्वास और लगन के अनुसार उसके अध्यात्मिक स्तर को बढाने में सही मार्गदर्शन करता है | गुरु शिष्य के लिए जो कुछ भी करता है उसे कभी भी जतलाता नहीं है, ना ही अपने शिष्य द्वारा प्राप्त किए धन, मन-सम्मान, अध्यात्मिक स्तर का श्रेय लेता है | गुरु अपने शिष्य से ऐसे कर्म करवाता है जो केवल शिष्य हित में होते है, गुरु काअपने  शिष्य के कर्म निजी लाभ के लिए प्रयोग करना वर्जित है |  गुरु की महिमा देवी देवताओं से अधिक है क्योंकि देवी देवता सीमित शक्ति/ कला के मालिक है, जिस व्यक्ति को जैसा चाहिए वह उस शक्ति/ वस्तु के मालिक देवी देवता की उपासना करके अर्जित कर लेता है जबकि गुरु सीधा निराकार से जुड़ा होने के कारण सभी कुछ ठीक प्राप्त करने में सहायक बनता है | साधारण व्यक्ति भी अपने अच्छे कर्मों और निस्वार्थ भावना से गुरु बन सकता है परन्तु यदि शिष्य का लक्ष्य गुरु बनना है तो वह अधूरा गुरु ही बन पता है वह पूरा गुरु नहीं बन सकता | पूरा गुरु का अर्थ है जो निस्वार्थ सब कुछ कर सकता है |

ईश्वर की कृपा और अपने कर्मो की पूँजी के अनुसार गुरु की शक्तियां अपने आप विकसित होने लगती है आध्यात्मिक स्तर बढ़ने के साथ साथ इन शक्तियों का विकास भी होता रहता है, सबसे पहले गुरु में वाकशक्ति/वाक्यशक्ति विकसित होती है वाक्यशक्ति विकसित होने पर गुरु द्वारा कही गयी सभी बाते पूरी होने लगती है | यहाँ तक की किसी व्यक्ति के भाग्य में ना होने वाली वस्तुएँ गुरु के वाक्य/वचन से मिलने लगती है, अनेकों लोगो की संतान होना या ऐसे कार्य होना जिसकी कल्पना भी ना की जा सकती हो, यह वाक्यशक्ति विकसित हो चुके होने का ही लक्षण है | वाक्यशक्ति के बाद गुरु में स्पर्श शक्ति विकसित होती है गुरु के आगे मस्तक झुकाने का एक कारण यह भी है कि गुरु अपने स्पर्श द्वारा मस्तक झुकाए व्यक्ति की सारी नकारात्मकता समाप्त कर देता है , गुरु के शरीर में जो सकारात्मकता संचार कर रही होती है वह व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर जाती है जिसके परिणाम से ग्रहों का प्रभाव, हानि, दुर्घटना, बुरे कर्मों का फल, शत्रु, बुरी नज़र, भूत-प्रेत इत्यादि से बचाव रहता है |

वाक्यशक्ति और स्पर्शशक्ति का प्रयोग संसार की इच्छाओं की पूर्ती के लिए होता है, लोगों का कल्याण करते करते गुरु में आत्मशक्ति विकसित हो जाती है | आत्मशक्ति संसार के लिए नहीं होती यह अलौकिक शक्ति होती है जो निराकार से जुड़े रहने के काम आती है | किसी चित्र/मूर्ती, नाम/मंत्र, स्थान, विधि इत्यादि पर अधीन ना होकर, खुली आँखों पर भी निराकार से जुड़े रहने की अवस्था को आत्मशक्ति विकसित होना कहते है | आत्मशक्ति का प्रयोग गुरु अपने शिष्यों की परलोक में सहायता करने में करता है | गुरु की मृत्यु के पश्चात, गुरु के स्थान में वह स्पर्शशक्ति और वाक्यशक्ति का प्रभाव रहता है , सच्चे गुरु की मृत्यु के पश्चात उसके स्थान को स्पर्श करने से मन को शांति और सुरक्षा का आभास होता है और वहां पर उच्चारण की जाने वाली सभी बाते पूरी हो जाती है |

वाक्यशक्ति, स्पर्शशक्ति और आत्मशक्ति तीनो होने पर गुरु में त्रिशक्ति होती है जिसके कारण कुछ भी सोचा या कहा गया पूरा होता है, यह त्रिशक्ति देवी देवताओं के पास नहीं होती क्योंकि देवी देवताओं के पास वाक्यशक्ति और स्पर्श्शक्ति को प्रयोग करने के लिए शरीर नहीं होता | देवी देवताओं के पास सीमित अधिकार/ शक्तियां होती है जैसे धन की देवी लक्ष्मी, विद्या  देवी की सरस्वती, ज्ञान के देवता बृहस्पति, इत्यादि देवी देवताओं के पास अलग अलग अधिकार/शक्तियां है | जो कार्य देवी देवताओं की उपासना से भी नहीं हो सकते वह गुरु के एक वाक्य से हो जाते है | इसीलिए कहा जाता है कि गुरु के पास ऐसी चाबी होती है जो हर बंद ताले को खोल सकती है | गुरु की निस्वार्थ भावना के कारणदेवी देवता भी गुरु की कही बात हो नहीं टालते |  जाने अनजाने बहुत से ऐसे कर्म हो जाते है जिसके कारण देवी- देवता, मृत्यु पश्चात भटक रहे पित्र(पूर्वज) और भूत-प्रेत क्रोदित हो जाते है, इन सभी के क्रोध का प्रभाव केवल गुरु के आशीर्वाद और सुदृष्टि से ही समाप्त होता है |

गुरु के पास इच्छा, आवश्यकता या विवशता के समय कर्मों की पूँजी को देने या लेने का अधिकार होता है । किसी व्यक्ति की भक्ति, प्यार, नम्रता, समर्पण इत्यादि से प्रसन्न हो कर भाग्य द्वारा ना मिलने वाली वस्तु को दे देना गुरु की इच्छा पर निर्भर है । सालों बाद किसी गुरु के आशीर्वाद से संतान हो जाना या बीमारी ठीक हो जाना गुरु द्वारा ऐसे कर्म दे देना होता है जो उस व्यक्ति के भाग्य में नहीं होता । किसी व्यक्ति द्वारा अपनी वाणी, भाव इत्यादि द्वारा अपने शुभ कर्मों का दुरूपयोग करने पर गुरु को उसके शुभ कर्मो को लेकर किसी और को देने का अधिकार होता है । सम्पूर्ण गुरु की कृपा या आशीर्वाद से सांसारिक और आध्यात्मिक सभी प्रकार की इच्छाओं को पूर्ण किया जा सकता है । व्यक्ति को समय समय पर गुरु की आवश्यकता इसलिए भी होती है कि गुरु ऐसे गुर सिखाता और बताता है जो पुस्तकों में नहीं मिलते ।

 

कलयुग गुरुओ से भरा पड़ा है परन्तु सही मार्ग दिखने वाले गुरुओं की कमी है, ऐसे में साधारण व्यक्ति के लिए गुरु का चयन करना अति कठिन है | सच्चा गुरु अपना ज्ञान और शक्ति विकसित करने की युति सरलता से अपने शिष्य/ भक्त को नहीं देता, इसका मुख्य कारण यह होता है कि कहीं शिष्य उस ज्ञान का दुरूपयोग निजी स्वार्थ के लिए ना कर ले | गुरु ज्ञान तभी देता है जब उसे यह निश्चित होता है कि उसका शिष्य इस योग्य है कि ज्ञान का दुरूपयोग नहीं होगा और शिष्य को समझ है कि ज्ञान का सदुपयोग कब कितना और कैसे करना है | शिष्य के इस स्तर को बार बार परखने के बाद ही गुरु अपने शिष्य को ज्ञान देता है | शिष्य की परख करने के लिए गुरु कटु वचनों का प्रयोग भी करता है और शिष्य को कठिन और अस्विकारिय कार्य करने को कहता है, यदि शिष्य बिना प्रश्न और संदेह किए गुरु की कसौटी पर खरा उतरता है तो शिष्य को गुरु द्वारा आशीर्वाद और कृपा में ज्ञान मिलता है, गुरु ऐसा ज्ञान देता है जो पुस्तकों और कहानियों में नहीं होता | ज्ञान ऐसे शिष्य को मिलता है जिसमे ज्ञान अर्जित करने की इच्छा, लगन और योग्यता होती है जिन शिष्यों में योग्यता नहीं होती गुरु उन पर समय नष्ट नहीं करता | योग्यता कर्मों के आधार पर होती है, शिष्य में योग्यता होने पर गुरु उस की उन्नति करने का अवसर नहीं छोड़ता | गुरु द्वारा बताये मार्ग पर सभी शिष्य नहीं चलते, अधिकतर लोग अपनी आवश्यकता, सुविधा और परिस्थिति के अनुसार कार्य करते है , जो लोग गुरुमार्ग पर चलते है उन्हें लोक-परलोक में कोई कष्ट नहीं होता |

गुरु द्वारा शिष्य को दिए जाने वाले ज्ञान से ही गुरु के अपने अध्यात्मिक स्तर का पता चल जाता है कि गुरु स्वयं निराकार से कितना जुड़ा हुआ है और उसमे कितनी योग्यता है, सच्चा गुरु आधा-अधूरा ज्ञान नहीं देता वह अपने शिष्य को पूर्ण ज्ञान देता है | शिष्य की अपनी रुचि और योग्यता के अनुसार उसकी अध्यात्मिक उन्नति करना और उसका सही मार्गदर्शन करना गुरु का मुख्य कार्य है | गुरु अपने शिष्य को मन और मस्तिष्क दोनों को काबू करने का गुर सिखाता है जिससे शिष्य सभी प्रकार की परिस्थितियों में भयभीत, भ्रमित या असहाय ना हो, शिष्य में धैर्य और नम्रता किसी विवशता के कारण नहीं हो अपितु यह उसके स्वभाव में हो, शिष्य में प्रशंसा करने और प्रशंसा सुनने की आदत नहीं हो, शिष्य अपने भाग्य पर निर्भर ना होकर अपने कर्म पर ध्यान दे और उसकी कर्मपूँजी इतनी हो की बिना मांगे ही आवश्यकता के अनुसार उसे सब कुछ अपने आप मिलता जाये, शिष्य संसार में रहते हुए भी किसी सांसारिक वस्तु या व्यक्ति से इतना ना जुड़े कि उसके मोक्ष का मार्ग कठिन हो जाए | सांसारिक ज्ञान तो सभी को होता है परन्तु गुरु सांसारिक विपत्तियों के साथ साथ अध्यात्मिक स्तर को विकसित करता है जिसके कारण शिष्य सदैव अपने गुरु का ऋणी रहता है, इस ऋण से मुक्त होने के लिए शिष्य अपने गुरु को गुरुदक्षिणा देता है | गुरु द्वारा मिला ज्ञान अमूल्य होता है फिर भी शिष्य बड़ी श्रद्धा से गुरु को अपनी सामर्थ्य के अनुसार भेंट देता है, कई बार तो शिष्य अपना शेष जीवन ही गुरु की समर्पित करके स्वयं को धन्य समझते है, आज के समय में ऐसे गुरु और शिष्य दोनों की कमी है |

ज्ञान की प्राप्ति से केवल ज्ञानी बना जा सकता है जबकि गुरु के पास आध्यात्मिक ज्ञान होने के साथ साथ देवी देवताओं का साथ और निराकार की कृपा भी होती है | सांसारिक ज्ञान और आध्यात्मिक ज्ञान में बहुत बड़ा अंतर है, ज्ञानी को आध्यात्म का ज्ञान हो यह आवश्यक नहीं है और गुरु को सांसारिक ज्ञान हो यह भी आवश्यक नहीं है | सांसारिक उन्नति के लिए सांसारिक ज्ञान का होना आवश्यक है और आध्यात्मिक उन्नति के लिए अध्यात्मिक ज्ञान होना चाहिए | कभी कभी ज्ञानी केवल ज्ञान तक सीमित रह जाते है क्योंकि उनके पास वो कृपा नहीं होती जिससे वो निराकार के रहस्य को समझ सके | आवश्यकता से अधिक ज्ञान भ्रम का कार्य करता है जो व्यक्ति को निराकार और उसकी कृपा से वंचित रखता है | गुरु के पास कृपा नामक वो चाबी होती है जिससे कोई भी सांसारिक या अध्यात्मिक ताला खुल सकता है | यदि गुरु चाहे तो अपने शिष्य को वह दिव्य चाबी पाने के योग्य बनने का मार्ग बता सकता है | समस्या तब आती है जब व्यक्ति स्वयं ही वह चाबी खोजने या बनाने का प्रयत्न करता है क्योंकि निराकार का नियम है कि कृपा रूपी चाबी केवल गुरु के द्वारा ही मिलती है | आधा अधूरा ज्ञान अंधकार के सामान है जो व्यक्ति को और भ्रमित करता है, ऐसे में कृपा और आशीर्वाद प्रकाश का कार्य करते है | गुरु कितना भी ज्ञान दे वो कम समझना चाहिए क्योंकि जो इतना दे सकता है उसके स्वयं पर कितनी और अधिक ईश्वरीय कृपा होगी | कभी भी यह नहीं समझना चाहिए कि मुझे गुरु ने सारा ज्ञान दे दिया और मुझ पर भी गुरु जितनी ही कृपा हो गयी है |

गुरु द्वारा एक गुप्त ज्ञान यह भी दिया जाता है कि निराकार की कृपा कभी भी दो लोगो पर एक सामान नहीं होती, संसार में दिखने वाला सभी कुछ एक दुसरे से भिन्न है जैसे पहाड़, नदिया, पेड़ पौडे, जीव जंतु इत्यादि | निराकार के स्वभाव में नक़ल करना नहीं है, एक बार जो बन गया वह दोबारा नहीं बनता, मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो दूसरों को देख कर आकर्षित होता है और नक़ल करने को विवश हो जाता है |

गुरु और शिष्य का अटूट सम्बन्ध है जो एक बार स्थापित हो जाये तो फिर कई जन्मों तक चलता है, जिस शिष्य के कर्म बहुत अधिक बलवान हों और उन कर्मो का फल अपने आप मिलना हो तो ऐसे शिष्य को ज्ञान देने गुरु स्वयं शिष्य के पास जाते है, जबकि साधारण कर्मों वाले शिष्यों को गुरु की खोज करनी पड़ती है | शिष्य कई प्रकार के होते है इनमे भक्त शिष्य होते है जो गुरु से दूर रहे या पास रहे इनके मन में गुरु के लिए श्रद्धा और भक्ति होती है, ये गुरु के वचनों पर चलना और गुरु की सेवा करके अपना जीवन बिताने को ही सब कुछ मानते है और अपना तन, मन, धन गुरु के लिए लगा देते है, गुरु के साथ या पास रहकर इन्हें अलौकिक आनंद की अनुभूति होती है | ऐसे शिष्यों से गुरु को आत्मिक प्रेम होता है |

कुछ शिष्य चतुर होते है, उन्हें गुरु की याद तभी आती है जब जीवन में कोई समस्या या दुःख हो, काम निकलने पर ऐसे शिष्य गुरु से दूर रहना ही पसंद करते है ऐसे शिष्य सांसारिक सुख सुविधाओं के लिए ही जीते है उन्हें मोक्ष या निराकार में कोई रुचि नहीं होती, ये समझते है कि गुरु थोड़ी सी सेवा करने में ही इनका कल्याण हो जायेगा क्योंकि गुरु ने अपने स्वार्थ के लिए नहीं इनके लिए जन्म लिया है | ऐसे शिष्यों को गुरु केवल सांसारिक वस्तुओं को पाने का मार्ग बताते है |

कुछ अन्य शिष्य ज्ञानी होते है हालाँकि इनकी गिनती बहुत कम होती है जो गुरु की रमज़ को समझते है, जिनको यह ज्ञान होता है कि गुरु के क्रोध या डांट, फटकार में भी उनका क्या लाभ है, ऐसे शिष्य यह जानते है कि गुरु अपने क्रोध या फटकार द्वारा उनके जाने अनजाने हो गए कुकर्मों का प्रभाव समाप्त करने में उनकी सहायता करके उनमे और अधिक अध्यात्मिक विकास होने की योग्यता बना रहे है । ऐसे शिष्यों के अध्यात्मिक विकास के लिए गुरु उन पर अधिक मेहनत करता है |

मोक्ष प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को निराकार का ज्ञान होना आवश्यक है और निराकार का ज्ञान होने के लिए व्यक्ति का अध्यात्मिक होना आवश्यक है, आध्यात्मिक होने के लिए पूर्ण गुरु का आशीर्वाद और कृपा होनी अति आवश्यक है |

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मेरे विचार

मोक्ष का ज्ञान तभी हो सकता है जब आत्मा के जन्म का ज्ञान हो |

संसारज्ञान – जीवन से मृत्यु का ज्ञान है और निराकारज्ञान – मृत्यु से जीवन का ज्ञान है |

सच को नहीं झूठ को खोजने का प्रयास करो, यदि झूठ का ज्ञान हो गया तो निराकार का ज्ञान अपने आप हो जाएगा |

जीवन में परिवर्तन चाहते हो तो क्या करना है पर नहीं,  क्या नहीं करना है पर अधिक ध्यान दो |

संसार का सबसे बड़ा अंधविश्वास है की निराकार किसी साकार रूप में मिलेगा |

संसार का सबसे कठिन कार्य अपने मन को समझाना है |

अपने मन को सीखने और खोजने में इतना व्यस्त कर दो कि इसे पाप करने का समय या अवसर ही ना मिले |

अपने मन को इतना टिकाओ कि आँखे खुली होने पर भी ध्यान निराकार में लगा हो |

किसी का मन भटकाना ऐसा पाप है जिसका कोई प्रायश्चित नहीं है |

जो भाग्य में है उसके पीछे भागने की आवश्यकता नहीं है और जो भाग्य में नहीं है उसके पीछे भागने का कोई लाभ नहीं है |

कर्मपूँजी इतनी हो कि बिना मांगे ही सब कुछ मिल सकता हो परन्तु कुछ मांगने की आवश्यकता ना हो |

ईर्ष्या से मुक्त होने के लिए दूसरों के कर्मों पर ध्यान मत दो |

स्वयं की प्रशंसा सुनना, अहंकार को निमंत्रण देना है |

धार्मिक से अध्यात्मिक होने में कई जन्म लगते है, अपनाना धर्म है और त्यागना आध्यात्म है |

ज्ञान होने और कृपा होना दोनों में बड़ा अंतर है |

उस वस्तु के पीछे मत भागो जिसके बिना गुज़ारा चलता है |

सच्चा गुरु वह है जो गुर सिखाए, और सच्चा शिष्य वह है जो गुरु ना बनना चाहे |

किसी के आध्यात्मिक ज्ञान से उसके गुरु के स्तर का पता चलता है |

गुरु के पास वह मास्टर चाबी होती है जो देवी देवताओं के पास भी नहीं होती |

बातें आना और निराकार का ज्ञान होना दोनों में बड़ा अंतर है |

भ्रम और भय से मुक्ति केवल ज्ञान द्वारा होती है |

सही मार्ग दिखाने से बढकर कोई पुण्य नहीं है |

कोई भी कर्म सही या गलत नहीं होता, सही या गलत होते है कर्म के परिणाम |

हे ईश्वर ! मुझे शून्य कर दो, जिसके साथ भी लगूं वह दस गुना बढ़ जाए |

 

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Vijay Batra : Karmalogist

Founder : शून्यपंथ – A Spiritual Community.
Chairman : College of Spiritual Education.
Secretary : Serve & Care Charitable Society.
Author of शून्यसंहिता :  विश्व की एकमात्र धर्मरहित आध्यात्मिक संहिता !

 

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प्रेम स्वार्थ है ! – Vijay Batra Karmalogist

प्रेम स्वार्थ है !      

लेखक : विजय बतरा Karmalogist

प्रेम शब्द में स्वयं के लिए शक्ति और दूसरे के लिए चिंता है, यह उदासी और तनाव में दवा का काम करता है और सभी प्रकार की समस्याओं और दुविधाओं को भूलने में भी अति लाभकारी है | प्रेम में व्यक्ति को मानसिक सुरक्षा का आभास होता है, ऐसा व्यक्ति मृत है जिसका जीवन प्रेमहीन है क्योंकि प्रेम ही जीवन है | प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी से प्रेम अवश्य करता है और साथ साथ यह भी चाहता है कि उसे कोई निस्वार्थ सच्चा प्रेम करने वाला मिले | हम सभी जानते है कि प्रेम किसी से भी और कहीं भी हो सकता है, जो निस्वार्थ हो, जात-पात, आयु, नियम के अधीन ना हो वही सच्चा प्रेम है | प्रेम को अन्धा और नासमझ कहा जाता है जबकि धर्म में प्रेम का बड़ा महत्त्व है | हम सभी प्रेम के अनेकों रूप देखते है जैसे मातापिता-संतान, गुरु-शिष्य, भाई-बहन, पति-पत्नी, मित्र-संबंधी इत्यादि |

हम सभी यह भी जानते है कि संसार में बिना स्वार्थ कुछ भी नहीं होता तो प्रेम निस्वार्थ या बिना शर्त कैसे हो सकता है ? ऐसा क्यों होता है कि इतने प्रकार के प्रेम पाकर भी व्यक्ति असंतुष्ट है ? क्या इसका कारण यह है कि जितना और जैसा प्रेम व्यक्ति चाहता है वह उसे नहीं मिलता और जैसा उसे मिलता है वैसे प्रेम की उसको इच्छा ही नहीं है ? सच्चा प्रेम करने वाले की पहचान क्या है ? सांसारिक और अध्यात्मिक प्रेम में क्या भिन्नता है ? सभी संबंधों में स्वार्थ है प्रेम नहीं ? प्रेम स्वार्थ है और स्वार्थ ही प्रेम है ? ईश्वर के प्रेम में भी स्वार्थ है ? प्रेम के बारे में ऐसे अनेकों प्रश्न सभी के मन में आते है जिनका सही उत्तर सभी जानना चाहते है |

प्रेम क्या है ?

प्रेम शब्द में आशा है, आवश्यकता है और साथ ही विवशता भी है | जहाँ आशा होती है वही प्रेम होता है बिना आशा व्यक्ति प्रेम नहीं करता | व्यक्ति जिनसे भी प्रेम करता है उनसे बहुत अधिक आशा रहती है कि उसे अन्य लोगो से अधिक समय और सम्मान मिले, उसका प्रेमी अति निष्ठावान (वफादार) हो, हालांकि व्यक्ति को जितने लोगों से प्रेम मिल रहा है उसके अतिरिक्त एक और से प्रेम की चाहत सभी को होती है और वह जितने लोगो को प्रेम करता है उनके अतिरिक्त एक और को प्रेम करना चाहता है | प्रेम सदा दूर की वस्तुओं और व्यक्तियों से होता है जो अपनी पहुँच से बाहर होते है, दूर का विकल्प दूर होता है इसलिए जो लोग उसके आसपास होते है उन्हें प्रेम करना व्यक्ति की विवशता होती है क्योंकि मनुष्य को जीने के लिए दूसरों पर आश्रित रहना पड़ता है | संसार में अकेला रहना अति कठिन है सभी को अपनी शारीरिक और मानसिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक दूसरे पर आश्रित रहना पड़ता है इसलिए प्रेम शब्द एक कड़ी है जो एक-दूसरे से संबंध स्थापित करने का कार्य करता है | प्रेम मन की शांति और प्रसन्नता के लिए किया जाता है परन्तु प्राय: मन के विचलित और उदास होने का कारण प्रेम ही होता है |

किसी से संबंध की इच्छा होने पर ही प्रेम होता है, इच्छा के साथ-साथ आजीवन निस्वार्थ लम्बा चलने वाला प्रेम मिलने की आशा भी होती है क्योंकि वचनबद्ध प्रेम की सभी को आवश्यकता है | एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति से आकर्षित होने के यही तीन कारण होते है | इच्छा, आशा या आवश्यकता के बिना प्रेम होने के लिए आकर्षण नहीं होता | प्रेम एक स्वार्थ और दिखावा है यह स्वार्थ शारीरिक या मानसिक होता है, जिस प्रेम में व्यक्ति का शारीरिक या मानसिक स्वार्थ पूरा नहीं होता वह प्रेम अगले ही पल घृणा में बदल जाता है | जब व्यक्ति की आशा समाप्त हो जाती है कि अब दूसरे व्यक्ति से मानिसक या शारीरिक आवश्यकता पूरी नहीं होगी तो उसका प्रेम घृणा का रूप ले लेता है | एक समय में एक से अधिक लोगो को प्रेम करने और प्रेम पाने की इच्छा सभी में होती है परन्तु सामाजिक व्यवस्था और नियम के कारण लगभग सभी लोग अपनी प्रेमिच्छा को दबाते है | प्रेम उस ऊर्जा का नाम भी है जो जीव के रक्त (खून) में होती है, जिसके रक्त में ऊर्जा नहीं होती उसमे प्रेम भाव नहीं होते |

प्रेम के कारण :

प्राय: प्रेम धन और शारीरिक संबंध बनाने इच्छा या आवश्यकता के कारण होता है, प्रेम साकार वस्तुओं से होता है जैसे स्थान, वस्तु, व्यक्ति इत्यादि | प्रेम में मन की ऐसी स्थिति होती है जिसमे हर वह वस्तु या व्यक्ति चाहिए जिसको व्यक्ति पाने में असमर्थ है, एक बार वह व्यक्ति या वस्तु मिलने पर प्रसन्नता के कारण प्रेम अधिक बढ़ भी जाता है और यह निश्चित होने पर कि अब यह व्यक्ति या वस्तु उसी की है वह केवल भोग का साधान होती है, एक समय सीमा के बाद दिलचस्पी समाप्त होने लगती है | एक दूसरे में दिलचस्पी समाप्त होने पर बहाने की तलाश की जाती है, जो बातें प्रेम होने की पुष्टि तक अनमोल या अति प्रिय लगती है वही बातें दिलचस्पी समाप्त होने पर एक दूसरे से अलग होने का कार्य करती है | प्रतिदिन नया, सबसे अधिक और अलग पाने की इच्छा व्यक्ति को दूसरों से प्रेम करने के लिए विवश करती है |

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दो लोगों द्वारा एक सामान इच्छा, सुविधा और परिस्थिति के कारण प्रेम होता है | दोनों ओर से बात करने या बार बार मिलने का अवसर और सुविधा होने पर प्रेम होना स्वाभाविक है | मिलने जुलने से एक दूसरे में दिलचस्पी बनती है जो आगे चलकर प्रेम कहलाती है | प्रेमी के बारे में अधिक से अधिक जानकारी प्राप्त करना व्यक्ति का लक्ष्य होता है | अपने प्रिय के सुबह उठने से लेकर रात को सोने और सपनो की जानकारी में भी व्यक्ति की उत्सुकता और रुचि होती है | दोनों ओर से अपने व्यवहार, रहन–सहन का दिखावा किया जाता है कि उन्हें किसी भी प्रकार की कोई भी समस्या नहीं है क्योंकि उन्हें ऐसे प्रेम से प्रेम है जिसकी उन्हें अब तक तलाश थी | प्रेम में एक-दूसरे को दिखावा किया जाता है कि उनके आसपास के लोगो से उन्हें वैसा प्रेम अब तक नहीं मिला जैसा उस प्रिय से मिल रहा है, अभी तक के मिले प्रेम या सम्मान का कोई महत्त्व नहीं होता |

दोनों व्यक्ति यह साबित करने का प्रयास करते है कि उसका प्रेम अधिक गहरा और निस्वार्थ है जबकि दोनों की इच्छा और आवश्यकता एक सामान होती है | कभी-कभी तो अपने प्रेम को अधिक दर्शाने के लिए झूठ और दिखावे का भी प्रयोग होता है, इसमें ऐसे शब्द और वाक्यों का प्रयोग भी होता है जिनसे असल ज़िन्दगी का कोई लेना देना नहीं होता, मनघडंत बाते और कहानियाँ बेझिझक कही जाती है, यह जानते हुए भी कि इनमे से आधे से अधिक बातें झूठ और निराधार है ऐसी बाते कहना और सुनना दोनों को अच्छा लगता है | प्रेम का जन्म विचार से होता है, देखने, बोलने और सुनने से यह बड़ा होता है इसमें शक्ति आती है, छूने से यह वृद्ध होता है और इसका अंत होता है | प्रेम(इच्छा, आशा, आवश्यकता) तब तक ही होती है जब तक प्रेमी को साकार रूप में ना पाया हो |

 

प्रेम का एक प्रकार मानसिक प्रेम भी है, मानसिक प्रेम दूरी या परिस्थिति के कारण होती है इसमें इच्छा और आवश्यकता से अधिक आशा होती है | दूसरे व्यक्ति से ऐसे वचन की आशा होती है जो अभी तक किसी ने ना किया हो और व्यक्ति में स्वयं भी ऐसा ही वचनबद्ध होने की इच्छा होती है, ऐसे प्रेम में जोखिम या जिम्मेदारी नहीं होती इसलिए अधिकतर लोग मानसिक प्रेम करना ही पसंद करते है | हालांकि प्रेम कभी भी छुपता नहीं है चेहरे के हावभाव से अन्य लोगो को यह ज्ञात हो जाता है कि व्यक्ति किसी से प्रेम करता है | जो लोग अधिक भावुक होते है उन्हें प्रेम की अधिक आवश्यकता होती है क्योंकि उनमे असुरक्षा और अकेलेपन के विचार अधिक होते है ऐसे लोग बहुत शीघ्र प्रेम करने लगते है और आशा करने लगते है कि दूसरा व्यक्ति भी उनसे बहुत प्रेम करता है |

कभी कभी दो लोगों में प्रेम की अवधि लम्बी चलती है जिसका मुख्य कारण बातचीत में एक दूसरे को दिए गए वचन है | जैसा प्रेमी मिला है वैसा कोई और व्यक्ति ना मिलना भी प्रेम की अवधि को बढाता है, एक प्रेमी की आदत होना और दूसरे व्यक्ति से विचार या अवसर का मेला ना खाना, किसी अन्य से प्रेम ना होने का कारण बनता है | व्यक्ति के पास दूसरा विकल्प हो और स्वयं की मान्यता और समाज का दबाव नहीं हो तब वह पुराने प्रेमीसाथी को छोड़कर नए के साथ होना पसंद करता है | पुरुष पर समाज का दबाव कम होता है इसलिए नए संबंध बनाने की पहल पुरुष ही करते है स्त्री पर संस्कार और परिवार का दबाव होने के कारण चाहते हुए भी वह अपने मन की बात नहीं कह पाती | ऐसा नहीं कि स्त्री में नए प्रेम पाने की इच्छा नहीं होती परन्तु एक बार फिर से गलत प्रेमी मिलने का डर उसे ऐसा करने से रोकता है |

कुछेक लोग किसी एक से इतने अधिक आकर्षित हो जाते है कि केवल उसी को पाना चाहते है, किसी अन्य व्यक्ति से वैसा प्रेम करना उनके लिए असंभव होता है इसलिए वह आजीवन अविवाहित भी रहते है | कभी-कभी तो उस व्यक्ति को भी नहीं पता होता जिसके लिए दूसरा अविवाहित रहता है इसे एकतरफा प्रेम (एक और से) कहते है | इच्छित प्रेमी से विवाह नहीं होने पर भी व्यक्ति अविवाहित रहते है ऐसे लोग प्रेम करने और विवाह नहीं करने ले लिए बाद में पछताते है | यूं तो ऐसा भी कहा जाता है कि प्रत्येक शादीशुदा आदमी को पछतावा होता है कि उसका विवाह उसके जीवन साथी से क्यों हुआ किसी और से क्यों नहीं, इसके पीछे भी किसी एक और से प्रेम पाने की इच्छा होती है |

एकदूसरे के प्रति वचनबद्ध होने के कारण प्रेम का अंत प्रेमविवाह है परन्तु अधिकतर प्रेमविवाह सफल नहीं होते इसका मुख्य कारण यह है कि पुरुष स्त्री को गर्दन से नीचे से प्रेम करता है और स्त्री पुरुष को गर्दन के उपरी भाग से प्रेम करती है यानी पुरुष स्त्री के रूप रंग से आकर्षित होता है और स्त्री पुरुष के विवेक और ज्ञान से आकर्षित होकर उसे प्रेम करती है | विवाह से पहले खुली आँखों से देखे गए सपने पूरे नहीं होने पर प्रेम की बलि चढ़ती है | विवाह के बाद शारीरिक संबंध और धन के कारण प्रेम किताबों में लिखी बातों जैसा लगने लगता है | विवाह से पहले की गयी बाते और साथ देखे सपने साकार नहीं हो पाते, कुछेक लोग प्रेम को प्रेम की तरह ही लेते है परन्तु एक समय के बाद नया करने और नया पाने की इच्छा दोनों में से एक को बेवफा बना देती है | प्रेम विवाह करने वाले अधिकतर लोगों को ना चाहते हुए भी साथ रहना पड़ता है क्योंकि परिवार वाले उन्हें कहेंगे कि विवाह का फैसला उनका अपना है उन्होंने परिवार वालों की बात नहीं मानी इसलिए अब जैसा भी है भुगतो, ऐसे प्रेम में इच्छा से अधिक विवशता अधिक होती है |

 

समाज, संस्कार और विचारधारा में बंधे हुए लोग ना चाहते हुए भी एक दूसरे के साथ जीवन बिताते है | सामाजिक तौर पर उन्हें ऐसा दिखना पड़ता है जैसे उनसे अधिक प्रेम कही हो ही नहीं सकता | दूसरों को प्रेम का पाठ पढ़ाने वाले प्राय: आवश्यकता के अधीन होकर परिवार के अधिकतर लोग जो कि एक-दूसरे को पसंद नहीं करते फिर भी साथ में रहते है |

शारीरिक आवश्यकता की पूर्ती के लिए स्त्रियों को वचन देना पुरुषों के स्वभाव में है जिस पर अधिकतर पुरुष खरा नहीं उतरते और जो अपने वचन को पूरा करते है उनमे से अधिकतर पुरुषों को  लडाई-झगडे या अपयश का डर होता है | आज की नारी भी अब पुरुष के स्वभाव को जान गयी है इसलिए वह समय समय पर इसका लाभ भी उठाती है | पुरुष अपनी समझ और मेहनत से कमाया धन खर्च करके अपना प्रेम स्त्री को दर्शाता है जबकि स्त्री अपना शरीर पुरुष को सौंप कर अपने प्रेम को पुरुष से अधिक दर्शाती है | प्रेम के लिए दिखावा करने की आवश्यकता नहीं होती, प्रेम में एक-दूसरे को अपना समय देने की आवश्यकता होती है | धन या शारीरिक संबंध केवल इस बात की पुष्टि के लिए होते है कि “मुझे तुमसे प्रेम है” यानी मैं अपनी इच्छा और सुविधा के अनुसार तुम्हारे साथ समय बिताना चाहता/चाहती हूँ |

प्रेम जब व्यक्ति के मस्तिष्क तक हावी हो जाता है तब वह परिवार, मर्यादा, संस्कार, शिक्षा, समाज इत्यादि को भूल कर ऐसे वचन बोलता है जिन पर चलना कठिन ही नहीं असंभव भी होता है जिसके कारण उसे जीवन में अपयश और हानि का सामना भी करना पड़ता है | जब ऐसा प्रेम दोनों और से हावी हो जाता है तब व्यक्ति के विचार और विवेक किसी भी हद तक जा सकते है | समाज में ऐसे बहुत सारे आश्चर्यजनक प्रेम सुनने और अनुभव करने को मिलते है, किसी रिश्तेदार, मित्र, पडोसी से शारीरिक संबंध होना ऐसे ही प्रेम का एक रूप है | शारीरिक आवश्यकता अधिक होने पर भी प्रेम को दर्शाया जाता है इसमें वाक्यों और शब्दों को अधिक महत्त्व दिया जाता है |

माता पिता

माता-पिता के प्रेम को संसार में निस्वार्थ प्रेम कहा गया है सभी माता पिता अपनी बच्चों के लिए हर संभव कार्य करते है | इसी प्रेम के कारण कभी तो वह अपने बच्चों के लिए ऋण भी लेते है तो कभी अपनी इच्छाओं को मार कर बच्चों की आवश्यकताओं को पूरा करते है | माता-पिता बनने से लेकर बच्चों के लिए सभी कुछ करने के पीछे तक उनका स्वयं का स्वार्थ होता है | माता-पिता बनने की इच्छा के साथ अपने बुढापे में सहारा होने की आशा और आवश्यकता भी होती है | संतान उत्पत्ति द्वारा सभी लोग सामाजिक तौर पर तक भी दर्शाते है कि उनमे किसी भी प्रकार की शारीरिक कमजोरी अथवा कमी नहीं है | माता-पिता उस बच्चे से अधिक प्रेम करते है जिसके साथ उनकी विचारधारा मिलती हो, जो उनकी बातों से सहमत होता हो, माता पिता के साथ ऐसे बच्चो का प्रेम नहीं होता जो अपनी इच्छा से कार्य करता है या माता पिता के कार्यों और वचनों से सहमत नहीं होता | हालांकि कुछ ना कर पाने की स्थिति में बच्चे और माता-पिता एक-दूसरे से प्रेम होने का दिखावा भी करते है ऐसा करने के पीछे भविष्य में एक-दूसरे पर आशा होती है | अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए संतान को माता-पिता पर आश्रित रहना पड़ता है इसलिए संतान माता-पिता से प्रेम करती है, माता-पिता की संपत्ति और समाज में लायक संतान दिखने के स्वार्थ से संतान अपने माता-पिता से प्रेम करती है |

भाई बहन एवं संबंधी

भाई-बहन के प्रेम में आवश्यकता होने पर एक-दूसरे से धन का सहयोग की आशा होती है | आपसी विचारधारा ना मिलने पर भी एक ही माता-पिता की संतान होने के कारण एक दूसरे से प्रेम दर्शाना विवशता होती है, इसमें समय-समय पर उपहार का लेन-देन प्रेम दर्शाने में सहायक होता है | मित्र-रिश्तेदारों के प्रेम में सामाजिक और आर्थिक सहायता वाला स्वार्थ है | यश पाने की इच्छा भी दिखावे वाले प्रेम को जन्म देता है | संसार में कुछ भी स्वार्थहीन नहीं है सभी प्रकार के प्रेम अथवा चिंता/ सहायता में कोई न कोई स्वार्थ अवश्य है |

गुरु शिष्य

गुरु-शिष्य का संबंध संसार के सभी संबंधों से उत्तम कहा जाता है क्योंकि इसमें सांसारिक लेन-देन नहीं होता इसे धर्म के साथ जोड़ा जाता है और यह भी कहा जाता है कि बिना गुरु के व्यक्ति की गति नहीं होती इसलिए गुरु होना आवश्यक है | अपने ज्ञान को शिष्यों तक पहुंचाकर पुण्यपूँजी जमा करने में गुरु का निजी स्वार्थ है, साथ-साथ यश और धन कमाना भी गुरु स्वार्थ है | सांसारिक समस्याओं और परिस्थितियों का सामना करने के लिए मानसिक सुरक्षा के भाव वाला स्वार्थ सभी शिष्यों में होता है, आत्मविश्वास और ज्ञान की कमी के कारण पापकर्म के विपरीत फल का भय और मोक्ष की लालसा भी शिष्य को स्वार्थी बनाता है,यह प्रेम स्वार्थ के साथ-साथ भय के कारण होता है |

 

धर्म में प्रेम का बहुत महत्त्व है, भक्त और भगवान के प्रेम और उसकी महिमा के बारे में हम सभी जानते है परन्तु यह प्रेम भी स्वार्थ से होता है इस प्रेम में स्वार्थ के साथ साथ स्वयं को धोखा देना भी शामिल है | जाने-अनजाने किए पाप से बचने के लिए देवी देवताओं से प्रेम करना स्वार्थ की चरम सीमा है, स्वयं को धोखा देने के लिए अधिक पूजा-पाठ या दान-पुण्य किया जाता है | सभी यह जानते है कि सभी को अपने–अपने कर्मों का फल अवश्य भुगतना होता है फिर भय के कारण झूठे प्रेम से कर्मों के फल से बचाव कैसे होगा यह कोई नहीं समझना चाहता | धर्म की आड़ में दिखने और दिखाने वाले प्रेम में ना दिखने वाला स्वार्थ है |

धन और यश पाने के स्वार्थ में एक देवी या देवता की उपासना छोड़ कर दूसरे की उपासना करना धार्मिक होकर भी महा अधर्मी होने का प्रमाण है | धर्म में आत्मा को नारी और परमात्मा को पुरुष भी कहा गया है यह तो ऐसा हुआ मानो एक स्त्री धन और यश के स्वार्थ हेतू अपने पति को छोड़ कर दूसरा विवाह कर लेती है क्या इसे प्रेम कहते है ?  घंटों पूजापाठ करने वाले लोग यह समझने लगते है कि उनके इष्टदेव उनसे अति प्रसन्न है इसलिए वह जो भी बोलते या करते है वह सही ही होता है यह प्रेम नहीं अपने आप को धोखा देना है |

प्रेम में असफल कुछ लोग देवताओं को अपना पति मानने लगते है यह प्रेम नहीं महापाप है देवी देवता हजारों- लाखों साल पहले साकार रूप में थे,  उनके दादा पडदादा से पहले कितनी ही पीढियां निकल चुकी है, पूर्वजों को पति मानकर अपने आप को धन्य समझना किस प्रकार का प्रेम है ? स्त्रियाँ देवताओं को पति कहती है इसी प्रकार यदि पुरुष किसी देवी को पत्नी कहने लगे तो क्या वह प्रेम भी सही है ? दरअसल स्त्रियों के ऐसे प्रेम में मानसिक स्वार्थ है जिन्हें अपने जीवनसाथी से सहयोग और आदर नहीं मिलता और उन्हें दूसरों पर विश्वास नहीं होता तो वह अपनी मानसिक तृप्ति के लिए देवताओं को पति कहना अथवा मानना आरंभ कर देती है | धर्म के अनुसार देखा जाए तो ऐसा करने से देवी देवता प्रसन्न नहीं होते उल्टा रुष्ट होते है परन्तु मनुष्य प्रेम अपनी सुविधा और स्वार्थ के लिए करता है इसलिए वह सही-गलत को समझना ही नहीं चाहता |

अनेकों लोग देवी-देवता को स्वप्न या साकार रूप में देखने के लिए उनसे प्रेम करते है, हर भक्त की यह इच्छा होती है कि वह अपने ईष्टदेव को देखे | जब तक उसे इष्टदेव के दर्शन नहीं होते तब तक वह उसके प्रेम में तड़पता है, अधिक से अधिक प्रयत्न करता है कि किसी भी यत्न से देव प्रसन्न हो जाये और मुझे साकार दर्शन हो | दर्शन होने पर अति प्रसन्नता होती है परन्तु साथ ही अब वह अपने इष्टदेव का प्रयोग अपनी सांसारिक सुख सुविधाओं के लिए करने का विचार करने लगता है कि अब इस कृपा का प्रयोग कैसे किया जाये | प्रेम को भूलकर सामाजिक यश पाने के स्वार्थ से लोगों पर अपनी कृपा करने का दिखावा करके भोले-भाले लोगो के ईश्वर के प्रति प्रेम का शोषण किया जाता है |

 

प्रेम सदा साकार से होता है, बिना देखे, सुने या सोचे प्रेम नहीं होता | प्रेम करने के लिए किसी की साकार छवि होना अति आवश्यक है, मस्तिष्क में छवि बनते ही प्रेम होने लगता है यानी मिलने, देखने और छूने की इच्छा होने लगती है | निराकार से कभी प्रेम नहीं होता क्योंकि निराकार स्वयं भी किसी से प्रेम नहीं करते | प्रेम-घृणा वाले विचार जीव में है निराकार स्वयं सांसारिक विकारों से मुक्त है | निराकार स्थिर है ! मनुष्य की तरह इधर उधर भटकना निराकार के स्वभाव में नहीं है | प्रेम को छोड़कर ही आध्यात्म में सफलता मिल सकती है क्योंकि जो साकार नहीं है वह किसी साकार वस्तु या व्यक्ति में नहीं मिल सकता |

आध्यात्मिक प्रेम सांसारिक प्रेम से भिन्न है, इसमें भिन्न प्रकार का स्वार्थ होता है, इस प्रेम में मानसिक, शारीरिक या धन की इच्छा या आवश्यकता नहीं होती | इसमें अपने प्रेमी/प्रेमिका के लिए निस्वार्थ एक दूसरे को अधिक से अधिक ज्ञान पहुंचाने का प्रयत्न करते है जिससे उसका मोक्षमार्ग सरल हो सके | एक की अध्यात्मिक सफलता दूसरे को ऐसी आत्मिक प्रसन्नता देती है जिसको शब्दों में नहीं बताया जा सकता | इसमें इच्छा, आकर्षण, आवश्यकता, विवशता नहीं होते, यदि कोई अध्यात्मिक मिल गया तो उसे सहयोग कर दिया नहीं मिला तो किसी के मिलने की इच्छा किए बिना अपनी जीवन यात्रा पूरी करनी होती है | ऐसा प्रेम लाखो-करोडो में से एक व्यक्ति में होता है और ऐसे व्यक्तिओं ने अपना जीवन निराकार को समर्पित किया होता है |

 

प्रेमी की पहचान कैसे करे :

जिस व्यक्ति से आप अपने मन की बात निसंकोच कह सकते हो और वह बात उसके पास गोपनीय रहती है, एक अच्छा प्रेमी होता है | प्रेमी या प्रेमिका को जानने के लिए अधिक से अधिक मिले और बात करे, मिलने पर ऐसे बात करे जैसे आप उसे पहले से ही जानते है | प्रेमी/प्रेमिका को इतनी सुविधा दीजिए कि वह अपने मन की हर बात खुल के बताए | एक मिलन में यदि दो घंटे से अधिक बात होती है तो तीसरे घंटे में उसके मुहं से ऐसी बाते निकलने लगती है जो वह आपके लिए सोचता है | इन्ही बातों से प्रेमी/ प्रेमिका के प्रेम की असलियत सामने आती है कि उसका प्रेम धन के लिए है या शारीरिक संबंध बनाने के लिए है | सभी की अपनी अपनी आवश्यकता होती है व्यक्ति की तीन प्रकार की आवश्यकताएं होती है यदि प्रेमी-प्रेमिका एक दूसरे की आवश्यकता को पहचान कर उस आवश्यकता को पूरा कर सकें तो प्रेम की अवधि लम्बी हो सकती है |

पहली आवश्यकता मानसिक होती है, व्यक्ति अपने प्रेमी/प्रेमिका में अच्छा श्रोता, समझदार और आवश्यकता पड़ने पर सही राह दिखाने वाला ढूंढ़ता है, समय-समय पर एक-दूसरे को प्रोसाहित करना, समझाना, तारीफ करना, सभी प्रकार की बाते निसंकोच करना भी मानसिक आवश्यकता का हिस्सा है | दूसरी आवश्यकता शारीरिक होती है, व्यक्ति अपने प्रेमी/प्रेमिका को मिलना और छूना चाहता है, समय-समय पर एक दूसरे के कार्य करना, घूमना फिरना, गले लगाना, चूमना और शारीरिक संबंध बनाना भी शारीरिक आवश्यकता का हिस्सा है | तीसरी आवश्यकता धन होती है, समय-समय पर एक दूसरे पर धन व्यय करना, उपहार देना, आवश्यकता के समय आर्थिक सहायता करना भी धन की आवश्यकता का ही हिस्सा है |

प्रेमी-प्रेमिका दोनों की आवश्यकता एक जैसी होने पर उनमे कभी भी प्रेम नहीं होता, एक की आवश्यकता मानसिक होने पर दूसरे की शारीरिक या धन की है, एक की शारीरिक और दूसरे की मानसिक या धन की है या एक की धन की और दूसरे की मानसिक या शारीरिक है और दोनों को एक-दूसरे की आवश्यकता पूरी करने में संकोच नहीं है तो उनमे प्रेम हो जाता है | यह स्वार्थयुक्त सांसारिक प्रेम है |

 

प्रेम में हानि :

प्रेम के कारण व्यक्ति समय, शक्ति और धन की हानि करता है | प्रेम होने पर व्यक्ति अपना अधिक से अधिक समय प्रेम में लिप्त रहने का प्रयास करता है अपनी सारी शारीरिक और मानसिक ऊर्जा प्रेम के बारे में सोचने और प्रेम करने में लगा देता है, अपने धन को प्रसन्न करने के लिए धन खर्च करने में संकोच नहीं करता | प्रेम मर्यादा में कभी नहीं चलने देता जिसके कारण अपयश (बेइज्जती) का सामना करना पड़ता है |

 

प्रेम आजकल :

विज्ञान ने इतना विकास कर लिया है कि प्रेम भी बहुत विकास हो गया है, प्रेम व्यक्त करने और करने के तरीके पहले के समय के मुकाबले आज बहुत सरल और तीव्र हो गए है | पहले के समय में प्रेमी या प्रेमिका एक- दूसरे का चेहरा देखने को तरसते थे अब घर बैठे इन्टरनेट और मोबाइल में तस्वीर-ए-यार मिल जाती है | पहले एक प्रेमी मिलना कठिन होता था अब एक साथ कई प्रेमी मिलते है जिस कारण मन अधिक भ्रमित हो गया है क्योंकि यह ही समझ में नहीं आता कि इतना अधिक प्रेम दिखने वाला व्यक्ति आखिर चाहता क्या है ? विज्ञान के इस विकास के कारण कुवारों के साथ-साथ शादीशुदा लोगो को भी प्रेम करने के अवसर मिल रहे हैं, इसके कारण परिवारों में कलह-कलेश और तलाक की संख्या भी दिन प्रतिदिन बढ़ रही है | इस नए तरीके के इन्टरनेटप्रेम में इतना आनंद है कि चाहते हुए भी यह नहीं छोड़ा जाता | इस प्रेम में एक से एक विकल्प है, व्यक्ति जैसा प्रेमी/प्रेमिका चाहता है वैसा मिल जाता है |

सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट ने प्रेम की प्रेम की परिभाषा ही बदल दी है | जिन्हें परिवार में समय और सम्मान कम मिलता है उनके लिए एक साथ कई लोग प्रेम में डूबे दिखते है, ऐसे लोग स्वयं को किसी फिल्म स्टार से कम नहीं समझते जिनके एक चित्र (फोटो) पर सैंकड़ो लाइक्स करते है | समय व्यतीत करने के लिए मनचले लोगों द्वारा लिखी बातों में उनको प्रेम ही प्रेम दिखता है जिसके कारण वह वास्तविक प्रेम से अलग प्रेम का अनुभव करते है | चैटिंग में ऐसी बाते सुनने को मिलती है जिनकी कल्पना केवल अपने मन में करते है, जीवनसाथी के साथ शारीरिक संबंध बनाते समय जो उत्तेजना का अनुभव नहीं हो पाता वह बातों में हो जाता है | इन्टरनेट पर मिले लोग एक दूसरे से पिछले जन्मों का नाता जोड़कर भावुक होने लगते है, चैटिंग में लोग स्वयं को प्यार के सागर में डूबा पाते है, ऐसे प्रेम में महिलायें अधिक भावुक हो जाती है, बहुत सारी महिलायें अपनी निजी फोटो भी पुरुष प्रेमियों को भेज देती है जिसका अंजाम भी हानिकारक होता है |

हैलो से शुरू हुई बातचीत जब सभी मर्यादाओं को पार कर्ट जाती है तब दोनों और से अति प्रसन्नता अनुभव की जाती है | हर प्रकार की बातें करने के बाद जब सब बाते समाप्त हो जाती है तो प्रेमी की दिलचस्पी समाप्त होने लगती है, प्रेमिका को समय कम देना आरंभ करता है और उसकी बातो में कमियाँ निकलना प्रारम्भ करता है | यह सब कुछ बहुत तेजी से होता है, यह बात प्रेमिका के ह्रदय में लगती है क्योंकि उसने जिस पुरुष पर विश्वास किया वह उसे समय और सम्मान नहीं देता | धीरे-धीरे इन्टरनेटप्रेम घृणा में बदलता है फिर बात मित्रों और परिवार तक पहुँचती है जिसके कारण दोनों का अपयश होता है, दोनों एक-दूसरे को दोषी ठहराते है परन्तु कोई लाभ नहीं होता | मन से दुखी महिला उस प्रेम को याद करती है जो उसमे अपने इन्टरनेट प्रेमी के साथ अनुभव किया होता है तभी कोई और पुरुष से बातचीत होनी आरम्भ होती है और फिर से वही सारी बाते, वायदे, कहानियाँ होती है परन्तु इस बार महिला समझ चुकी होती है कि अब पुरुष को क्या चाहिए |

जिन लोगों को केवल बातें करके इन्टरनेटप्रेम का अनुभव करना होता है वो लोग करने लग जाते है, जिनको वास्तविक प्रेम की इच्छा होती है वह लोग बातों से आगे बढकर मिलने में रुचि रखते है | इन्टरनेट प्रेम मिलने के बाद लम्बा चलने की सम्भावना बहुत ही कम होती है, हालाँकि आजकल तो इन्टरनेट पर मिले लोगो के आपस में विवाह भी होते है | इन्टरनेटप्रेम मध्यम वर्ग में आम बात है मित्र बनाने के पीछे का स्वार्थ सभी जानते है इसलिए सभी इस प्रेम वह संतुष्टि और प्रसन्नता की खोज में है जो उन्हें निजी जीवन में अपनी परिस्थिति के कारण नहीं मिलते |

प्रेम :

प्रेम होने का कोई भी कारण हो सकता है जैसे सौंदर्य, बुद्धि, धन, रहन-सहन, व्यवहार, कार्य, स्थान, इत्यादि | प्रेम के पीछे एक निजी स्वार्थ अवश्य होता है जब यह स्वार्थ दोनों ओर से होता है तब यह प्रेम घनिष्ठ होता है और यह लम्बी अवधि तक चलता है | सभी के मन में अपने प्रेमी/प्रेमिका की एक छवि होती है, सभी को ऐसा एक प्रेमी या प्रेमिका चाहिए जो किसी और के पास नहीं हो जो सबसे अलग हो और जो अभी तक उसके पास नहीं है | मन की ऐसी आशाओं को पूरा करने के लिए एक प्रेमी की आवश्यकता सभी को है जो अभी तक पूरी नहीं हो पाई है |

 

याद रखने योग्य बातें :

प्रेम का अर्थ है किसी को अपना बनाओ या उसके बन जाओ |

प्रेम जीवन में बहुत कुछ है परन्तु सब कुछ नहीं है |

प्रेम में प्रेमी/प्रेमिका की कमियाँ नहीं दिखती |

प्रेम को लम्बी अवधि तक चलाना चाहते हो तो अपने प्रेमी/प्रेमिका को अपने बारे में सब कुछ ना बताओ |

प्रेम किए बिना प्रेम नहीं मिलता, और बिना प्रेम मिले आप किसी से प्रेम नहीं करते |

प्रेम केवल उसी व्यक्ति से होता है जिससे आशा या आवश्यकता होती है |

प्रेम में दोनों लोगो का स्वार्थ होता है, परन्तु पहल करने वाले का स्वार्थ अधिक होता है |

प्रेम में दूर होना प्रेमी की उत्सुकता को बढाता है, अधिक समीपता दिलचस्पी घटाता है |

प्रेम में नीचा नहीं दिखाया जाता, प्रेमी-प्रेमिका का एक-दूसरे के लिए सम्मान और सहयोग बराबर होता है |

प्रेमी/प्रेमिका का अचानक बदला व्यवहार इस बात को दर्शाता है कि वर्तमान परिस्थिति के अनुसार पहले जैसी सामान सुविधा या अवसर नहीं मिल सकता | यह एक-दूसरे आशा के समाप्त होने का संकेत भी है |

एक तरफ़ा प्रेम के परिणाम हानिकारक होते है, किसी के लिए ह्रदय में उपजे प्रेम को अवश्य कहो |

किसी के विचार, सुन्दरता या धन से आकर्षित होने की जल्दी ना करे, यदि कोई आपको आकर्षित करने का प्रत्न करता है तो इसका अर्थ है वह आपसे आकर्षित हो चुका है |

प्रेम जितना, जैसे और जिससे मिले पाने की चेष्टा करो, यदि कोई आपसे प्रेम चाहता है तो अपनी सुविधा के अनुसार अवश्य प्रेम करो |

प्रेम आपकी मानसिक या पारिवारिक समस्या का कारण नहीं बनना चाहिए |

प्रेमी/प्रेमिका को पाने या छोड़ने के बहाने ना बनाओ, परिस्थिति और आवश्यकता को समझो |

प्रेम नहीं करो दूसरे की चिंता करो, प्रेम में केवल चाहत है |

जीवनसाथी को इतना समय और प्रेम दो कि उसे किसी और प्रेम की तलाश ना रहे |

बेवफा कोई नहीं होता उनकी आशाएं और आवश्यकताएं अधिक होती है |

प्रेम में वह व्यक्ति बेवफा नहीं है जिसे अभी तक विकल्प या अवसर नहीं मिला |

प्रेम धर्म के लिए बना है, आध्यात्म में प्रेम का कोई स्थान नहीं है |

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श्री बतरा जी के बारे में :

श्री विजय बतरा कर्मज्ञाता और आध्यात्मज्ञाता होने के साथसाथ आध्यात्मिक लेखक और आध्यात्मिक शिक्षक भी है | श्री बतरा जी अनेकों वर्षों से आध्यात्म के प्रचार और अंधविश्वास की समाप्ति के उद्देश्य से इन्टरनेट और व्यक्तिगत रूप से मिलकर भारत और विदेशों में हजारों समस्याग्रसित और आध्यात्मिक खोज करने वाले लोगों का मार्गदर्शन कर चुके है | इनके आध्यात्मिक विचार, लेख, पुस्तकें व्यक्ति को भय एवं भ्रम से मुक्त करके सकारात्मक जीवन जीने की कला सिखाती है | इनका जीवन आध्यात्म को समर्पित है इसी कारण इन्होने उन प्रश्नों के तार्किक उत्तर लिखे है जिन प्रश्नों का उत्तर अभी तक रहस्य ही बने हुए थे | दूसरों की सहायता करने में तत्पर रहने वाले श्री बतरा जी ने सर्व एंड केयर चैरिटेबल सोसाइटी (SERVE & CARE CHARITABLE SOCIETY) संस्था बनाई जिसके द्वारा हर वर्ष अनेकों लोगों की सहायता की जाती है | आध्यात्मिक शिक्षा के प्रचार के लिए इन्होने कॉलेज आफ स्पिरिचुअल एजुकेशन (COLLEGE OF SPIRITUAL EDUCATION) प्रारंभ किया जिसका लाभ आध्यात्मिक रुचि रखने वाले लोगों को हो रहा है | धर्म द्वारा फ़ैल रहे भ्रम और भय को समाप्त करने के लिए श्री बतरा जी ने शून्यपंथ की भी स्थापना की है जो विश्व का एकमात्र पंथ है जिसमे केवल शून्य/ईश्वर और आध्यात्म का प्रचार है इसके अतिरिक्त किसी धर्म, व्यक्ति, ग्रंथ इत्यादि का प्रचार नहीं है | श्री बतरा जी नकारात्मक ऊर्जा से ग्रसित लोगों को अपने विशेष परामर्श और आध्यात्मिक उपचार से मानसिक आरोग्यता प्रदान कर रहे है, आप भी इसका लाभ श्री विजय बतरा KARMALOGIST से मिलकर उठा सकते है |

Vijay Batra : Karmalogist

Founder : शून्यपंथ A Spiritual Community.
Chairman : College of Spiritual Education.
Secretary : Serve & Care Charitable Society.
Author of
शून्यसंहिता : विश्व की एकमात्र धर्मरहित आध्यात्मिक संहिता !